पराली और प्रदूषण

हमारे देश में महत्वपूर्ण मुद्दों की तरफ ध्यान न देना अपने आप में एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है क्योंकि इस वर्ष मानसून के अन्तिम चरण में पहुँच जाने और उत्तर भारत के खेतों में धान की कटाई के बाद उसकी पराली को सही तरह से उपयोग करने के लिए जो भी कोशिशें पिछले वर्ष की गयी थीं उनके कोई सकारात्मक परिणाम सामने आते नहीं दिखाई दे रहे हैं. आज एक बार फिर से उत्तर भारत की हवाओं में इस पराली के खेतों में जलाये जाने के चलते प्रदूषण…

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सेना के असुरक्षित कैंप

पठानकोट के बाद उरी में हुए आतंकी फिदायीन हमले जिस तरह से सेना के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित कैम्प्स की सुरक्षा से जुड़े हुए गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं वहीं इस बात पर भी विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे सैनिक इस तरह के हालात में रह रहे हैं जहाँ पर उनके लिए अपनी सुरक्षा कर पाना भी मुश्किल हो रहा है ? यह सही है कि स्थायी छावनी और विभिन्न तरह के अस्थायी कैम्प्स में सुविधाओं में बड़ा अंतर हुआ करता है फिर…

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हिंदी दिवस की सार्थकता

देश की राजभाषा के रूप में स्वीकार की गयी हिंदी आज़ादी के बाद से ही विचित्र स्थिति में उलझी हुई दिखाई देती है क्योंकि अधिकांश मामलों में केवल भाषायी राजनीति को आगे रखकर ही देश की राजभाषा के साथ अन्य प्रचलित प्रान्तीय भाषाओँ की बहुत बड़े स्तर पर अनदेखी होती रही है. वैसे तो सरकार की तरफ से विभिन्न स्तरों पर राजभाषा के विस्तार और उपयोग को बढ़ाने के लिए लगातार ही काम किये जाते रहते हैं पर जिस स्तर पर इसमें आम जनमानस की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए…

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