वैचारिक अभिव्यक्ति और विभेद

अभी तक के स्थापित मानकों के अनुसार जिस तरह से यह समझा और कहा जाता कि शिक्षा बढ़ने के साथ मनुष्य का सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत विकास अच्छी तरह से हो सकता है पर पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से अशिक्षितों के साथ शिक्षितों की मानसिक स्थिति भी एक जैसी ही होती जा रही है वह सम्पूर्ण मानव जाति के लिए आने वाले समय में एक खतरा बन सकती है. विश्व के कई देशों में इस्लाम के नाम पर चल रहे चरमपंथ को जिस तरह से उच्च शिक्षित लोगों…

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तीन तलाक़

मुसलमानों में तीन तलाक़ की स्थिति को लेकर जिस तरह से हर पक्ष अपनी अपनी बातों को लेकर स्पष्टीकरण देने में लगा हुआ है उससे यही लगता है कि यह पूरा मामला इस्लाम में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से सम्बंधित होते हुए भी कानूनी उलझनों और बिना बात के बयानों में उलझता जा रहा है. किसी भी देश में नागरिकों को मिले मौलिक अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त हैं और भारतीय संविधान लिंग, धर्म, जाति, भाषा और नस्ल के आधार पर किसी भी भेदभाव के खिलाफ अपनी मंशा दिखाता है पर…

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खादी अब विचार नहीं बाज़ार

अंग्रेजों से स्वाभिमान और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए अंग्रेजों की भाषा में जिस “अधनंगे फ़क़ीर” ने देश को खादी पहनने के लिए पिछली सदी में सबसे अधिक प्रेरित किया था वह मोहन दास करमचंद गाँधी भी आज की चापलूसी भरी राजनीति में अपने को नितांत अकेला ही महसूस करते क्योंकि जिस तरह से उनके सपने को आज बाज़ार से जोड़कर पूरी बेशर्मी के साथ केवल आंकड़ों पर ही बात की जा रही है उसे देखते हुए किसी भी परिस्थिति में उन्हें बापू के विचारों का समर्थक तो कहीं से…

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