राजनैतिक लोग और संवैधानिक पद

                                                          राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब द ड्रमैटिक डेकेड में १९८० की एक घटना के ज़िक्र पर जिस तरह से इस बात का समर्थन किया कि देश के संवैधानिक पदों पर केवल लम्बे राजनैतिक अनुभव वाले लोगों को ही बैठाया जाना चाहिए अपने आप में एक महत्वपूर्ण बात है. हालाँकि अभी तक राष्ट्रपति के पद पर एस राधाकृष्णन और डॉ कलाम ही दो गैर राजनैतिक लोग पहुँच पाये हैं फिर भी राजनीति से इतर क्षेत्र से आये हुए लोगों के लिए कई बार राजनैतिक दृष्टि से संवेदनशील मसलों तथा संवैधानिक…

Read More

लोकपाल और लोकतंत्र

                                           तीन साल से समाज सेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में लड़ी जा रही लोकपाल की लड़ाई अब अपने अंतिम चरण में पहुंची हुई है जहाँ से अब देश को एक काफी सशक्त विधेयक के माध्यम से एक लोकपाल मिलने ही वाला है. जिस तरह से दिल्ली में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में संघर्षरत रहे अरविन्द केजरीवाल की आप पार्टी ने बड़ी राजनैतिक पार्टियों के सामने जनता के विश्वास का संकट खड़ा कर दिया तो उसके बाद इस विधेयक के पारित होने की सभी सम्भावनाएं दिखायी…

Read More

लोकपाल पर आरोप प्रत्यारोप

        जैसा कि लोकसभा में लोकपाल विधेयक के पारित होने के समय से ही लगने लगा था कि इस बिल के लिए राज्यसभा में रास्ता आसान नहीं होने वाला है ठीक वैसा ही हुआ. यह सही है कि इस मसले पर भले ही विपक्ष सरकार को असफल बता रहा हो और सरकार विपक्ष पर आरोप लगा रही हो पर कुल मिलकर इस पूरी कवायद में लोकतंत्र ही हारा है क्योंकि जिस तरह से सबने अपनी अपनी सुविधाओं के अनुसार इस विधेयक पर राजनीति शुरू की उसकी कोई ज़रुरत ही नहीं…

Read More