चुनाव सुधार की तरफ

केंद्र सरकार की तरफ से चुनाव सुधारों पर कुछ पहल करते हुए जिस तरह से लोकसभा और राज्यों के विधान सभा चुनावों के एक साथ कराने की बात कही जा रही है उससे निश्चित तौर पर देश के धन को बचाने में मदद मिलेगी पर क्या भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में इस तरह की किसी गतिविधि से केंद्र में शासन कर रहा दल निरंकुश नहीं हो सकता है ? आज की परिस्थिति में चूंकि कहीं न कहीं किसी राज्य में प्रतिवर्ष चुनाव होते रहते है तो उनके कारण कुछ कदम…

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चुनाव, चंदा और राजनीति

देश के राजनैतिक दलों को जिस तरह से अपने संसाधनों के रूप आम लोगों से चंदा लेने के लिए जो छूट दी गई थी वह टीएन शेषन के ज़माने से ही चुनाव आयोग के निशाने पर रही है फिर भी उस पर नये सिरे से कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया जा सका है जिससे आज नोटबंदी के समय में सभी राजनैतिक दल इस बात के लिए आम लोगों के लिए और भी अधिक संदेहास्पद बन गए हैं कि नियम केवल आम लोगों के लिए हैं और राजनेताओं को उससे हर…

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कांग्रेस – राजनैतिक उतार चढाव

                                                            २८ दिसंबर को अपने स्थापना के १३० वर्ष पूरे करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने आज जिस तरह से विश्वसनीयता का संकट है उसके चलते अब उसके पास अपने लिए खोई हुई ज़मीन तलाशने के लिए बहुत सारे विकल्प खुले हुए हैं. पूरी दुनिया में राजनीति में सक्रिय दलों के सामने इस तरह के संकट सदैव ही आते रहते हैं जब जनता का उनके सरकार चलाने के तौर तरीकों से मोह भंग होने लगता है और वह उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया करती है. २००४…

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