एक राष्ट्र एक चुनाव की परिकल्पना

मोदी सरकार की देश में लोकसभा- विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाने की मंशा पर विभिन्न स्तरों पर विचार करने की दिशा में काम शुरू हो गया है पर क्या इस तरह प्रयास से आने वाले समय में देश को कोई लाभ होगा या फिर देश एक नयी तरह की तानाशाही युक्त लोकतान्त्रिक अराजकता की तरफ बढ़ जायेगा ? आज के समय भी जिस तरह से त्रिशंकु सदन बनने पर सरकार बनाना पूरी तरह से केंद्र सरकार की मंशा पर ही निर्भर हो चुका है उससे आने वाले समय में…

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एक साथ चुनाव

देश में इस समय लोकसभा और विधानसभा चुनावों के एक साथ कराये जाने की संभावनाओं पर गंभीर विचार शुरू भी नहीं हुआ है पर जिस तरह से इस पर बातें की जा रही हैं वे कहीं न कहीं से इस बात को रेखांकित अवश्य करती हैं कि सरकर चुनाव आयोग इस दिशा में सोच अवश्य रहे हैं. यह बात कहने में जितनी आसान लगती है क्या उसे धरातल पर उतार पाना भी संभव है अब इस बात पर विचार की आवश्यकता भी है. लोकतंत्र में राजनैतिक अस्थिरता के आने के…

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चुनाव सुधार में नैतिकता

देश में होने वाले चुनावों में नेताओं की भाषा और नैतिकता का स्तर जिस तरह से निरंतर रसातल की तरफ जा रहा है उसको देखते हुए अब चुनाव सुधारों में ही इस बात की आवश्यकता भी समझी जानी चाहिए कि नेताओं को दंड के भय से अनुचित बातें कहने और आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने से रोकने के बारे में भी उचित और कठोर संशोधन किये जाएँ. एक समय था जब बड़े नेताओं से लगाकर छोटे स्तर तक की राजनीति में सक्रिय लोग किसी भी परिस्थिति में नैतिकता की…

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