कश्मीर – पत्थरबाज़ी और अर्थव्यवस्था

कश्मीर घाटी में आतंकी अलगाववादियों के समूहों की तरफ से जिस तरह माहौल को लगातार बिगाड़ने का काम किया जा रहा है उसे देखते हुए वहां पर शांति अभी दूर की कौड़ी ही लगती है पर जिस तरह से राज्य सरकार में शामिल भाजपा के लिए परिस्थितियां मुश्किल होती जा रही है उससे राज्य के साथ देश की राजनीति पर भी पड़ने वाले असर को नकारा नहीं जा सकता है. अपनी चिरकालीन कश्मीर नीति से पीछे हटते हुए जिस तरह से मोदी और भाजपा ने राज्य सरकार में साझेदारी की और आज वह जिस तरह से अपने को उस परिस्थिति में फंसा हुआ पा रही है जिसके उसने कल्पना भी नहीं की थी जिससे केंद्र सरकार और भाजपा के पास विकल्प ख़त्म होने जैसी स्थिति बन गयी है. देश के सामने ख़त्म होते अवसरों के साथ अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों के समय अब भाजपा के पास ५ सालों में कश्मीर के लिए कुछ ठोस कर दिखाने के लिए कहने लायक कुछ भी नहीं है जिससे उसके चुनावों वायदों और असलियत में काम करने की स्थिति पर मामला स्पष्ट होता दिखता है.

पीडीपी के साथ रिश्ते शुरू करने से पहले ही भाजपा को यह सोचना चाहिए था कि एनसी के मुक़ाबले हर स्तर पर पीडीपी द्वारा आतंकियों की खुलकर हिमायत की जाती है जिससे भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपने लिए शर्मिंदगी के अलावा कुछ भी नहीं बचने वाला है पर कांग्रेस मुक्त भारत को हकीकत में बदलने के लिए किसी भी स्थिति तक जाने को तैयार मोदी और शाह की जोड़ी ने अपने और पार्टी के आदर्श श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सपनों के कश्मीर के साथ खेलने में भी कोई कस्र नहीं छोड़ी। ऐसा कर पाने में वे इसलिए भी आसानी से सफल हुए क्योंकि उनका मुखर्जी से सीधा कोई लेना देना नहीं था जबकि अटल अडवाणी आदि नेताओं के लिए मुखर्जी नारों से कहीं अधिक महत्व रखते थे? कश्मीर के लिए कुछ भी अच्छा करने के हर कदम में पूरा देश हमेशा से ही केंद्र सरकार के साथ रहा है पर २०१५ के बाद से जिस तरह से माहौल में बदलाव आता चला गया और आज सुरक्षा बलों और आतंकियों दोनों तरफ से कश्मीरी और भारतीय नौजवान मारे जा रहे हैं यह स्थिति आखिर कैसे पनपी इस बात का जवाब सम्भवतः किसी के पास नहीं है और ऐसे सवाल का जवाब कोई अति महत्वाकांक्षी नेता देना भी नहीं चाहता है.

आज जब बुरहान वानी के पूरे आतंकी समूह का सफाया करके सुरक्षा बलों को एक बड़ी सफलता हाथ लगी है तो महबूबा मुफ़्ती की सर्वदलीय बैठक और सुरक्षा बलों की तरफ से वाजपई की तरह एक तरफा युद्ध विराम की बातें करना किसी भी तरह से विचार के लायक ही नहीं है क्योंकि अब अलगाववादियों की हरकतें सुरक्षा बलों पर हमलों से बढ़कर आम पर्यटन तक पहुँच गयी है जिससे कश्मीर घाटी की पर्यटकों की आने वाले सीजन में आय घटने की पूरी सम्भावना है। अलगाववादी तो यही चाहते हैं कि आम कश्मीरी हमेशा ही अभावों में जिए जिससे उसे आने वाले समय में आसानी से जिहाद के नाम पर आतंकी बनाया जा सके ? क्या केंद्र और राज्य सरकार को यह छोटी सी बात समझ नहीं आती है और क्या घाटी के लोगों को देश की मुख्यधारा की आर्थिक गतिविधियों से अलग करके आतंकी आम कश्मीरी को भूखा रखकर जिहाद के लिए उकसाने की नीति पर काम नहीं कर रहे हैं? लखनऊ में जिस तरह से गृह मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से युद्धविराम की बात पर विचार करने की बात कही गयी है उससे यही लगता है कि यह भाजपा की कोई सोची समझी रणनीति है जिससे वह एक बार फिर युद्ध विराम करके आतंकियों के हौसलों को बढ़ाने की तरफ जाने वाली है? केंद्र सरकार ने आज तक पाकिस्तान लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं अपनायी है तो कश्मीर के पाकिस्तानी आतंकियों के सहारे चलने वाली अशांति को लेकर उसके पास किसी नीति की स्पष्टता की आशा कैसे की जा सकती है? अब समय आ गया है कि जम्मू और लेह क्षेत्र को घाटी से अलग कर केंद्र शासित या स्वायत्तशाषी क्षेत्र घोषित कर वहां की परिस्थितियों के अनुरूप काम शुरू किया जाये जिससे अलगाववादियों को केवल घाटी तक सीमित कर शेष राज्य की परिस्थितियों को सुधारने की दिशा में सही तरह से काम किया जा सके.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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