एक्सप्रेस वे और सुगमता

देश के हर कोने में यातायात को सुगम बनाने के उद्देश्य से बनने वाले किसी भी एक्सप्रेस वे से निश्चित तौर पर दो बड़े शहरों के बीच की दूरी भले ही सिमट जाती हो पर जिस उद्देश्य को लेकर इनका निर्माण शुरू किया गया था हमारे देश में वह कहाँ तक पहुँच पाया है संभवतः इस पर अभी किसी का भी ध्यान नहीं गया है. राज्य सरकारों राजमार्ग प्राधिकरण और बीओटी के अंतर्गत निजी क्षेत्र द्वारा बनाये जाने वाले विभिन्न एक्सप्रेस वे पर यदि कोई समग्र रिपोर्ट तैयार की जाये तो वह कहीं से भी बहुत उत्साहजनक नहीं होगी क्योंकि इनकी वर्तमान अवधारणा और उसके आस-पास बसे हुए शहरों को इनसे कितना लाभ हुआ है इस पर अभी तक कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. अब भी इस बारे में नीतिगत सुधार नहीं किये गए तो आने वाले दिनों में इनको बनाने वाली सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की संस्थाओं के लिए बैंकों से लिए गए लोन के ब्याज के खर्चे निकलना भी मुश्किल हो सकता है और देश में शहरों को जोड़ने के लिए अच्छे, सुरक्षित तथा सस्ते मार्ग उपलब्ध कराने की पूरी कवायद पर भी पानी फिर सकता है. इस बारे में पहले से बनाये गए एक्सप्रेस मार्गों की पूरी स्थितियों का आंकलन करके अब नए सिरे से इन्हें नई नीति के अंतर्गत बनाये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि दो दशक पहले की नीतियां आज के समय में उतनी प्रभावशाली साबित नहीं हो सकती हैं.
इस बात को समझने के लिए देश में सबसे कम समय में बिना किसी विवाद के उच्च गुणवत्ता से बनने वाले आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे का उदाहरण लिया जा सकता है जो निश्चित तौर पर आने-जाने वालों को पसंद आ रहा है पर इसके साथ जिन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए संभवतः आज भी सरकार का ध्यान वहां तक नहीं पहुंचा है जिससे यह बेहद उपयोगी साबित हो सकने वाला मार्ग आज भी उपेक्षा का शिकार सा लगता है. इस तरह से बनने वाले हर एक्सप्रेस वे के बारे में विस्तृत योजना अवश्य बनायीं जानी चाहिए जिससे इसके दोनों तरफ बसने वाले लगभग १०० किमी दूरी तक के शहरों से यहाँ तक पहुँचने के लिए कम से कम टू लेन मार्ग व्यवस्था होनी चाहिए और यदि कहीं पर यातायात अधिक है तो वहां की आवश्यकता के अनुरूप इसे फोर लेन करने के बारे में कार्य किया जाना चाहिए. आज यदि दिल्ली से चलने वाले तीर्थयात्री या पर्यटक आगरा से नैमिषारण्य (सीतापुर) तक जाना चाहें तो उनके पास अच्छा मार्ग होने के साथ ही छोटा मार्ग चुनने का विकल्प नहीं है जिससे वे मजबूरी में अच्छे और लम्बे मार्ग से चलने को अभिशप्त हैं और उन जगहों पर अनावश्यक यातायात बढ़ रहा है जहाँ पर इसको नहीं होना चाहिए साथ ही पुराने बसे शहरों में जाम की समस्या और भी विकराल होती जा रही है. कन्नौज से नैमिषारण्य की दूरी लगभग ८० किमी से भी कम है पर सीधे गंगा नदी पार कर प्रतापनगर चौराहे आने वाले मार्ग की दशा आज भी अच्छी नहीं है जिससे यह यातायात या तो हरदोई या फिर बांगरमऊ होते हुए नैमिषारण्य तक आ सकता है जिसमें समय ईंधन आदि बर्बाद होते हैं. यदि इस सीधे मार्ग को सीतापुर से अच्छी सड़क से जोड़ दिया जाये तो इस मार्ग का उपयोग करने वाले आसानी से बिना किसी जाम में फंसे अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं.
यह तो एक मात्र उदाहरण ही है क्योंकि जब इस तरह से एक्सप्रेस मार्गों तक पहुँच को अच्छा बनाया जायेगा तो इनका उपयोग भी बढ़ाया जा सकता है जिससे इनको बनाने और चलाने में लगने वाली लागत को भी कम किया जा सकेगा. आज मंहगे टोल के चलते भी निजी गाड़ियों से कभी-कभार सफर करने वाले लोग इन मार्गों से सिर्फ इसलिए भी बचने की कोशिशें करते हैं क्योंकि उन्हें टोल के रूप में भी काफी धन खर्च करना पड़ जाता है. यदि प्रयास कर इन मार्गों तक पहुँच को अच्छा बनाया जाये और टोल को भी तर्क संगत किया जा सके तो आने वाले समय में इनको बनाने वाली संस्थाओं के पास अपनी लागत को वापस पाने के बेहतर विकल्प उपलब्ध हो जायेंगें जिस वे अन्य जगहों पर मार्गों को बनाना के लिए अपने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर पाने के लिए स्वतंत्र हो सकेंगें. हम भारतीय जिस तरह से लम्बी दूरी की सड़क यात्रा में आनंद को खोजते हैं तो नीतियों में उन पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है और जहाँ से अन्य शहरों को जाने के लिए कट बनाये गए हैं वहां पर खाने-पीने, गाड़ियों की मरम्मत से जुडी व्यवस्थाओं के बारे में भी काम किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि ४/५ घंटे के सफर में एक दो स्थानों पर रुकने की आवश्यकता भी होती है जिसको किसी भी स्तर पर अनदेखा नहीं किया जा सकता है. आने वाले समय के लिए इन स्थानों के समग्र विकास से लम्बी दूरी की यात्रा करने वालों के लिए यह बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं.
अब समय आ गया है कि यूपी जैसी घनी आबादी वाले राज्यों में बनने वाले एक्सप्रेस मार्गों और पहले से बने हुए मार्गों कि बारे में आंकड़े इकट्ठे किये जाएँ जिससे आने वाले समय में आज होने वाली समस्याओं से निपटने में सहायता मिल सके तथा जिन उद्देश्यों से इनका निर्माण किया जा रहा है उसकी पूर्ति भी हो सके. आज की स्थितियों कि अनुरूप यदि भविष्य की योजनाओं के बारे में विचार नहीं किया गया तो इन एक्सप्रेस मार्गों की दशा भी पहले से उपलब्ध राजमार्गों जैसी ही हो जाने वाली है. बड़े राज्यों में राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर इस दिशा में अभी से सोचने की आवश्यकता है जिससे आबादी और यातायात के दबाव को झेलने के हिसाब से पूरे देश में राजमार्गों और एक्सप्रेस मार्गों का सही उपयोग किया जा सके. आर्थिक रूप से उपयोग में सस्ते और सुरक्षित होने के साथ इन पर भरपूर यातायात भी हो जिससे इनकी लागत को समय से निकाला जा सके और देश में राजमार्गों के विकास के वर्तमान परिदृश्य को और भी सुधारा जा सके अब यही समय की आवश्यकता हो गयी है.

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