यूपी के जातीय मामले

यूपी में जाति विशेष के अधिकारियों कर्मचारियों के तबादले पर उसका समर्थन या विरोध केवल राजनैतिक कारणों से ही हो रहा है. समाज के हर वर्ग में हर तरह के लोग पाए जाते हैं पर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से योग्यता पर जाति, बिरादरी, क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाने लगी उसके बाद यह स्थिति तो सामने आनी ही थी। पिछली सरकार में जिस तरह से यादवों को हर जगह प्राथमिकता दी गयी और भाजपा उसे चुनावी मुद्दा बनाने में सफल रही उसके बाद विवादित लोगों का हटना तय ही माना जा रहा था. अखिलेश सरकार के २०१२ में सत्ता सँभालने पर यह आशा की गयी थी कि पिछली सपा सरकार की तरह जातीय पोस्टिंग से बचा जायेगा पर जनता में यही सन्देश गया कि इस मामले में अखिलेश भी मुलायम जैसे ही हैं. अब यदि योगी सरकार विवादित लोगों को हटाने की तरफ बढ़ रही है तो उससे किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह उसका संवैधानिक अधिकार है। योगी सरकार ने अभी तक बड़े पैमाने पर तबादले भी नहीं किये हैं तो संभव है वे अधिकारियों को अपनी वास्तविक क्षमता दिखाने का अवसर दे रहे हों और आने वाले समय में जो उनके पैमानों पर खरे नहीं उतरेंगें उनको हटाने के आदेश जारी किये जायेंगें। दिल्ली और गोरखपुर से साफ़ तौर पर सन्देश दिए जा चुके हैं कि सांसद और विधायक किसी भी परिस्थिति में ट्रांसफर पोस्टिंग की सिफारिशें सरकार से न करें और केवल सरकार की नीतियों के अनुपालन पर ही ध्यान देते हुए निगरानी रखें इससे जहाँ नौकरशाही को नियमानुसार कार्य करने का मौका मिलेगा वहीं उन पर काम करने और अपनी क्षमता दिखाने का पूरा अवसर मिलेगा।

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