कृषि यन्त्र और खेती

                            कृषि प्रधान देश होने के बाद भी भारत में जिस तरह से आज भी अधिकांश भागों में परंपरागत तरीके से खेती की जाती है उसके कारण से भी पैदावार पर असर पड़ता है जिससे निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ने किसानों को आधुनिक कृषि यंत्रों की सहायता से खेती करने की सलाह दी है. परिषद के वैज्ञानिक कृषि यन्त्र बनाने वाली कम्पनियों के साथ मिलकर भी काम कर रहे हैं जिससे छोटे किसानों के उपयोग में आने वाले विभिन्न कारगर यंत्रों का निर्माण किया जा सके जो देश की खाद्यान्न आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके. अभी तक जिस तरह से कृषि क्षेत्र में जितना ध्यान दिए जाने की आवश्यकता थी किसी भी सरकार ने उस बारे में कोई समग्र नीति नहीं बनायीं है. कहने के लिए देश में केंद्र स्तर पर बाकायदा एक भारी भरकम कृषि मंत्रालय हैं और उसके साथ ही मिलकर काम करने के लिए राज्यों में भी इसी तर्ज़ पर मंत्रालय मौजूद हैं फिर भी इस क्षेत्र में जिस प्रगति की ज़रुरत है वह आज भी दिखाई नहीं देती है और एक बार कृषि ऋण के चक्कर में उलझ कर किसान पूरे जीवन तक उसी में उलझा रहता है और कई बार ये ऋण उसके लिए जान लेवा भी साबित होते हैं.
                 जिला स्तर और विकास खंड स्तर पर जिस तरह से कृषि विभाग के अधिकारियों की पहुँच आम किसानों तक होनी चाहिए वह अभी तक नहीं हो पायी है जिससे केवल भेड़ चाल के चक्कर में किसान हर वर्ष ही फसल चक्र के आर्थिक स्वरुप को न समझ पाने के कारण आज भी दुर्दशाग्रस्त है. आम तौर पर देश में कृषि क्षेत्र का जो भी उत्पादन होता है उसके बारे में सरकार अपनी पीठ ठोंक लिया करती हैं कि यह उनके प्रयासों का ही नतीज़ा है पर वास्तविकता कुछ और ही होती है. किसी भी वर्ष मानसून के कमज़ोर पड़ने का असर किस तरह से मुंबई के शेयर बाज़ार से लेकर सरकार तक पर पड़ता है यह सभी जानते हैं इसके बाद भी अभी भी जिस स्तर पर निजी क्षेत्र कि भागीदारी कृषि क्षेत्र में होनी चाहिए वह आज भी कहीं से दिखाई नहीं देती है ? सरकारी स्तर पर किये जाने वाले ९५ % काम केवल खाना-पूरी और अपने लक्ष्य को पाने के लिए ही किये जाते हैं फिर उनका सही लाभ कैसे दिखाई दे सकता है जब उस काम के पीछे मंशा ही ठीक नहीं होती है. सरकार को कृषि के बारे में किसानों को जागरूक करने के लिए सही दिशा में प्रयास करने चाहिए केवल नीतियां बनाने से कृषि का क्या हाल हो रहा है यह किसी से भी छिपा नहीं है.
                 आज किसानों में जागरूकता के अभाव में किस तरह से किसान देखा देखी की खेती कर रहे हैं क्योंकि किसी वर्ष किसी उपज के अच्छे दाम मिलने के बाद अधिकांश किसान अधिक लाभ के लिए अगली बार उसे ही लगते हैं जिससे उसकी अधिकता होने के कारण लागत निकलना भी मुश्किल हो जाता है और उस स्थिति में किसान के पास कोई चारा नहीं बचता है खीझ और बदहाली में वह फिर से किसी अन्य फ़सल पर चला जाता है जिससे उसकी मुश्किलें कभी भी आसान नहीं हो पाती हैं. इस बारे में जागरूकता बढ़ाने का काम किया जाना आवश्यक है क्योंकि आम किसान को एक तरह की उपज पर निर्भर रहने के स्थान पर मिली जुली खेती पर ध्यान देना चाहिए जिससे किसी एक फ़सल पर मौसम की मार या अधिक उत्पादन होने की दशा में उसका एक स्थान से होने वाला घाटा दूसरी जगह से पूरा हो जाये. कई बार ऐसा होता है कि जितने पैसे खर्च करके एक फ़सल को तैयार किया जाता हैं उसकी लागत भी नहीं निकल पाती है जो कि किसान के लिए समस्या बढ़ाती है. सबसे पहले छोटे किसानों को इस तरह की खेती के लिए जागरूक किया जाना चाहिए क्योंकि जब वे इस तरह से लाभ की स्थिति में आएंगें तभी वे कृषि यंत्रों को खरीदकर उनसे आधुनिक ढंग से खेती कर पाने में सफल होंगे. केवल नीतियों से कुछ नहीं सुधर सकता है उसके लिए ज़मीनी हक़ीक़त को समझ कर सही दिशा में काम करने की ज़रुरत है.         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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  1. यहां जो बात बताई गई है वो अक्षरंशह सही है, यहां हम लोगों के साथ ऐसा ही होता है मेरा नाम सुनील दत्त पाण्डेय ग्राम दमकी पत्रांक बाली (निचलौल) जनपद महराजगंज उत्तर प्रदेश से हूँ मेरी तो सरकार से यही विनती है कि हमारे फसलों का सही भाव दे मसलन् अगर हम एक एकड में धान लगाते हैं तो उसके खर्चे के अनुसार हमें कुछ नहीं मिलता कारण धान का रेट कम से कम ढाई हजार रुपये प्रति क्विंटल तथा गेहूं का भी रेट इसके हिसाब से मिले तब जाकर किसानों के चहरे पर खुशियां दिखाई देंगी नहीं तो किसान हमेशा पीटता रहा है और पीटता रहेगा। आप चाहें तो ये बात प्रकाशित कर सकते क्योंकि जो सच्चाई है वही मैंने लिखा है यही है हर किसान के मन की बात।

    धन्यवाद 👏👏👏👏

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