५० दिन बाद के विकल्प

८ नवम्बर को की गयी नोटबंदी की घोषणा के बाद ५० दिन पूरे होने पर जिस तरह से बड़ी घोषणाओं के बारे में खुद पीएम ने कहा था पर लगता है कि अधिकांश रुपयों के वापस आ जाने के कारण अब सरकार के हाथ कुछ अधिक ही बंधे रहने वाले हैं जिससे आम लोगों को उस तरह की छूट या सुविधाएँ नहीं मिल पाएंगीं जैसा सरकार और जनता ने सोचा था. अब इस पूरी कवायद के कारण देश को होने वाले लाभ-हानि पर लंबे समय तक विचार विमर्श किया जाता रहेगा क्योंकि अभी भी किसी को यह नहीं पता है कि इसके कितने अच्छे और कितने बुरे परिणाम सामने आ सकते हैं ? कुल मिलाकर पुराने नोटों में से अभी तक ९०% से भी अधिक नोटों के वापस आ जाने से सरकार को बड़ा धक्का ही लगा है क्योंकि उसके अनुमान के अनुसार लगभग ३ से ५ लाख करोड़ रूपये वापस नहीं आने चाहिए थे जिससे सरकार को शुद्ध रूप से इतना लाभ हो जाता पर आज की स्थिति को देखने के बाद तो यही लगता है कि सरकार अपने इस मंसूबे को किसी भी तरह से पूरा कर पाने में विफल हो चुकी है हाँ इसका एक तात्कालिक लाभ यह अवश्य दिखाई देने लगा है कि जो लोग अभी तक शंकाओं के कारण डिजिटल पेमेंट के बारे में सोचना भी नहीं चाहते थे आज वे भी इस तरफ कुछ कदम बढ़ा चुके हैं.
जिस तरह से सरकार की तरफ से आश्वासन दिए जा रहे हैं तो उनको देखते हुए आम लोगों की नज़रों में इस नोटबंदी को सफल बताने के लिए सरकार आयकर में छूट की सीमा को बढ़ा सकती है जिससे उसकी आमदनी पर बहुत बड़ा अंतर नहीं पड़ने वाला है क्योंकि प्रारंभिक स्तर पर कर देने वाले नागरिकों की संख्या बहुत कम है और छूट का स्तर बढ़ाये जाने से नए लोगों को आयकर की सीमा में होने के बाद आयकर चुकाने के लिए प्रेरित भी किया जा सकता है. सरकार की तरफ से रियल स्टेट में भी बड़े कदम उठाये जाने की प्रबल संभावनाएं भी हैं क्योंकि इस क्षेत्र में भी काले धन का बड़ी मात्रा में निवेश किया जाता है जिस पर नियंत्रण किये बिना किसी भी तरह से सरकार को काले धन पर रोक लगाने में पूरी मदद नहीं मिलने वाली है. आम आदमी अभी भी यही मान रहा है कि मोदी सरकार इस नोटबंदी के बाद उसके लिए सुविधाओं का पिटारा खोलने वाली है जबकि सरकार को भी यह अच्छे से स्पष्ट हो चुका है कि किसी भी परिस्थिति में अब वह लोगों को अधिक नहीं दे सकती है जिससे विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने एक और भी अवसर मिल सकते हैं. पांच राज्यों में आगामी चुनावों को देखते हुए सरकार के लिए कुछ घोषणाएं करना मजबूरी ही है क्योंकि इन राज्यों के लोगों को नोटबंदी का समर्थन करने के बदले कुछ मिलने की आशा को भी सरकार को पूरा करना है.
देश का दुर्भाग्य है कि हर वर्ष कहीं न कहीं चुनाव ही होते रहते हैं जिससे कई बार महत्वपूर्ण घोषणाएं करने पर चुनाव आयोग से अनुमति लेने की आवश्यकता भी पड़ जाती है पर केंद्र सरकार की तरफ से किये जाने वाले कामों पर आमतौर पर कोई रोक नहीं लगती है. इन चुनावों के बीच ही देश का आम बजट भी आना है जिससे लोगों की निगाहें उस पर भी टिक चुकी हैं क्योंकि जिन वायदों को किया गया है उनमें से कुछ को पूरा करने के लिए अब सरकार भी दबाव में आ चुकी है. आर्थिक मामलों को दलीय राजनीति से पूरी तरह अलग ही रखना चाहिए जिससे देश के लिए उठाये जाने वाले क़दमों पर किसी भी तरह की राजनीति संभव ही न हो पाए पर भारत में इस तरह से सोचने की दृष्टि अभी किसी भी राजनैतिक दल के पास नहीं है. सरकार और विपक्ष को मिलकर कम से कम अगले २० वर्षों के लिए नीतियों को अंतिम रूप देना चाहिए जिसमें किसी भी तरह का संशोधन केवल ३/४ बहुमत से ही किये जाने का प्रावधान भी होना चाहिए जिससे समय रहते देश की आवश्यकताओं के लिए स्पष्ट नीतियों का निर्धारण किया जा सके. राजनीति अपनी जगह है पर देश के विकास से जुड़े मुद्दों पर सरकार और विपक्ष दोनों को सकारात्मक होना ही पड़ेगा क्योंकि यदि भाजपा ने संयोग किया होता और २०१० में ही जीएसटी लागू करने की तरफ कदम बढ़ा दिए गए होते तो आज मोदी सरकार के पास काम करने के लिए दूसरी प्राथमिकताएं निर्धारित करने के लिए समय और ऊर्जा बची रहती जिसे आज वह इस बिल पर खर्च करने में लगी हुई है.

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