४० और लापता

            महाराष्ट्र पुलिस की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ महीनों में लगभग ४० मुस्लिम युवक अप्रत्याशित तरीके से गायब हो गए हैं जिसके बाद पुलिस ने इस तरह से गायब होने वाले संदिग्ध युवकों और उनके संपर्कों पर कड़ी नज़र रखने का फ़ैसला किया है. पुलिस को इस बात की आशंका है कि ये सभी वही लोग हैं जिनका कभी न कभी प्रतिबंधित आईएम से किसी न किसी रूप में संपर्क रहा है और अब संभवतः किसी तरह से देश से बाहर चले गए हैं या फिर जाने के लिए तैयार बैठे हैं. कम से कम इस बात पर अब संतोष व्यक्त किया जा सकता है कि पुलिस ने इस तरह से काम करना सीखना शुरू कर दिया है और वह अपने हिसाब से बदलने की कोशिश भी करने में लगी हुई है. अभी तक पुलिस को यह पता ही नहीं होता था कि किन स्थानों से प्रतिबंधित संगठन अपने काम को अंजाम देने में लगे हुए हैं पर २६/११ के बाद से पुलिसिंग में आया बदलाव आने वाले समय में निश्चित रूप से देशके लिए लाभकारी साबित होने वाला है. देश में मुस्लिम युवाओं को जेहाद और इस्लाम के नाम पर हमेशा से ही बरगलाये जाने की कोशिशें की जाती रही है पहले ये काम दाऊद और अन्य भूमिगत माफिया करते थे पर अब यह काम आतंकियों के ज़रिये किया जा रहा है. मुसलमानों में अशिक्षा का स्तर ऊंचा होने के कारण खाड़ी देशों में जाकर पैसा कमाने की लालसा हमेशा से बनी रहती है जिस कारण से भी कई बार काम की तलाश में गए महत्वकांक्षी युवा आसानी से इन लोगों के चंगुल में फँस जाते हैं.
         किसी भी जगह से पुलिस द्वारा किसी भी युवक की संदिग्ध गिरफ्तारी पर देश में मानवाधिकार वादियों के पेट में ऐंठन होने लगती है पर जब इस तरह से बड़ी संख्या में युवक गायब या भूमिगत हो रहे हैं तो उनके बारे में कोई चिंतित नहीं है इससे क्या साबित होता है ? क्या मानवाधिकार के नाम पर कुछ लोग केवल आतंकियों के अधिकारों की बात ही नहीं कर रहे हैं ? अधिकार केवल उसी के लिए होते हैं जिन्हें कर्तव्यों का पालन करना आता है जिन्हें दूसरों के अधिकारों की फिक्र नहीं है उनके अधिकारों को सही कैसे ठहराया जा सकता है ? क्या कारण है कि किसी भी युवक के परिवार से किसी के गायब होने की कोई खबर नहीं दी गयी है और अगर ऐसे में किसी आतंकी घटना में शामिल किसी युवक को पुलिस संदेह के आधार पर पूछ ताछ के लिए हिरासत में लेती हैं तो इसे मुस्लिम युवकों पर अत्याचार बताया जाने लगता है ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि इनके परिवारों की जानकारी में ही ये जेहाद में जुटे हुए हों और पकड़े जाने पर हो हल्ला मचाने और सामाजिक सहानुभूति बटोरने के लिए इनके परिवार वाले भी अभी चुप लगाकर बैठे हों ? किसी भी संदिग्ध के गायब होने पर पुलिस को तुरंत ही उनके परिवार से पूरी पूछताछ करनी चाहिए जिससे आने वाले किसी बड़े संकट को टाला जा सके क्योंकि २६/११ जैसा आतंकी हमला करने के लिए देश में स्लीपिंग सेल की मौजूदगी हमेशा से ही आतंकियों के लिए बड़े सहयोग का काम करती रहेगी.   
          पुलिस को इन गायब युवकों के परिवारों और संपर्कों को तुरंत ही सुरक्षा रडार पर लेना चाहिए क्योंकि इस तरह की छोटी छोटी घटनाओं से तैयार होने वाले आतंकी ही आने वाले समय में देश केलिए सरदर्द बन सकते हैं. अगर आवश्यकता हो तो इन परिवारों के लिए यह आवश्यक किया जाये कि वे उन युवकों के बारे में बताएं कि वे कहाँ गए हैं तथा उनकी तस्दीक भी करायी जानी चाहिए और बताई गयी जानकारी सही न निकलने पर पूरे परिवार पर नज़र रखना शुरू किया जाना चाहिए. इस मामले को धार्मिक चश्में से देखने की ज़रुरत बिलकुल भी नहीं है क्योंकि देश के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने वालों को माफ़ नहीं किया जा सकता है. देश की पुलिस में उतनी कमी नहीं है जितनी हमारे राजनैतिक तंत्र में है क्योंकि कई बार अपने वोट बैंक के चक्कर में नेता उन कठोर क़दमों को उठाने में चूक जाते हैं जो यदि समय अपर उठा लिए जाएँ तो पूरा सुरक्षा परिदृश्य बदल सकता है. आतंक से निपटने के लिए कड़े कानून और विशेष अदालतों का गठन किया जाना चाहिए और किसी भी तरह की आतंकी घटनाओं में शामिल आतंकियों को आम जेलों में रखने के स्थान पर विशेष रूप से बनायीं गयी जेलों में ही रखा जाना चाहिए जहाँ उनसे कोई भी न मिल सके. इन आतंकियों से किसी के भी मिलने पर भी पूरी पाबन्दी होनी चाहिए क्योंकि जब इन्हें मानवाधिकारों की चिंता नहीं है तो इनको किसी भी तरह के अधिकार आख़िर कैसे दिए जा सकते हैं राजनीति को किनारे रखकर अब देश को कड़े कानून पर काम करने की ज़रुरत है.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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