“हुद-हुद” का सामना

                                             देश के दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट की तरफ तेज़ी से बढ़ते हुए समुद्री चक्रवात “हुद-हुद” की तीव्रता के बारे में जिस तरह की ख़बरें सामने आ रही हैं उन्हें देखते हुए इनके प्रभाव में आने वाले आंध्र प्रदेश, ओडिसा और झारखंड के लोगों को सचेत किये जाने का काम शुरू किया जा चुका है. चक्रवात के बारे में आरम्भिक अनुमान पता चलते ही तटीय क्षेत्रों में इससे निपटने के सभी प्रयास शुरू कर दिए गए थे. यह ठीक उसी तरह का चक्रवात लग रहा है जैसे पिछले वर्ष पैलिन था पर उससे प्रभावित ओडिशा ने जिस तरह से मौसम विभाग और आपदा प्रबंधन के बेहतर तालमेल से जानमाल के नुकसान को बहुत हद तक काम करने में सफलता पायी थी वह देश में एक मिसाल ही है. कहने को ओडिसा कम संसाधनों वाला पिछड़ा राज्य है पर उसने जिस तरह से प्रशासनिक दक्षता के साथ अपने काम को किया था वह देश के अन्य राज्यों के लिए प्राकृतिक आपदाओं के समय एक प्रेरणा बन सकता है.
                                              पिछले कुछ वर्षों में मौसम विभाग के सटीक अनुमानों के साथ इस तरह की आपदाओं से निपटने में हम काफी हद तक सक्षम होते जा रहे हैं वह देश के लिए अच्छा संकेत ही है पर आज भी समुद्री तटों से दूर रहने वाले राज्यों में आपद प्रबंधन के नाम पर काफी कुछ किया जाना शेष है क्योंकि पिछले वर्ष ही उत्तराखंड की विभीषिका में मौसम विभाग के अनुमानों पर सही अमल न कर पाने से होने वाली भयावहता को सभी लोग देख ही चुके हैं और इस वर्ष भी जम्मू और कश्मीर में आई बाढ़ से कुछ ऐसा ही सीखने को मिलता है. प्राकृतिक अपदाओं का कोई स्थान नहीं होता है क्योंकि २०१० में लेह भी बाढ़ की चपेट में आ चुका है जबकि उसे पर्वतीय मरुस्थल कहा जाता है. देश में पिछले कुछ वर्षों में मौसम विभाग ने जो काम किया है अब उसको आपदा प्रबन्ध के साथ जोड़ने की आवश्यकता भी है क्योंकि मौसम जनित आपदाओं से बेहतर तालमेल के साथ ही निपटा जा सकता है.
                                             आशा की जानी चाहिए कि ओडिसा को अपने पिछले बार के अनुभव को और भी अच्छी तरह से लागू करने में सफलता मिलेगी तथा साथ ही आंध्र प्रदेश भी इससे काफी हद तक निपट पायेगा परन्तु इस पूरे प्रकरण में जिस तरह से झारखण्ड तक भी इसका असर दिखाई देने वाला है तो यदि वहां तक इसकी तीव्रता कम नहीं हुई तो इस क्षेत्र में व्यापक नुकसान हो सकता है. वैसे भी चक्रवात समुद्री क्षेत्र से ज़मीन पर आने के बाद धीर धीरे अपनी तीव्रता को खोने लगते हैं और शांत हो जाते हैं पर उनके रास्ते में जो क्षेत्र पहले आते हैं वहां पर नुकसान होना अवश्यम्भावी होता है. जन हानि को बचाने के लिए सबसे पहले उसी पर ध्यान दिया जाता है फिर मवेशियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है. ओडिसा ने यह पिछले वर्ष यह दिखा ही दिया है कि यदि जनता सरकार के प्रयासों में साथ रहे तो किसी भी परिस्थिति का सामना आसानी से किया जा सकता है समुद्री तटों के पास रहने वाले लोगों के लिए संचार के अन्य संसाधनों को भी बढ़ावा देने हैम और सामुदायिक रेडियो पर को बढ़ावा देकर इस तरह की चुनौतियों से निपटा जा सकता है.           
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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