सर्जिकल स्ट्राइक और संसद

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से ही जिस तरह से देश में माहौल बना हुआ है उसके बारे में कहीं न कहीं से सरकार की संवेदनशीलता में कमी ही दिखाई दे रही है क्योंकि इतने सफल और महत्वपूर्ण प्रयास के बाद जिस तरह से देश में छिछले स्तर की राजनीति शुरू हुई उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं थी पर संभवतः हमारा लोकतंत्र और नेता अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर सही तरह से सामंजस्य बनाकर काम कर सकें. यह सही है कि सेना के काम में सदैव ही सही दिशा होती है पर कई बार राजनैतिक लाभ हानि पर विचार करते हुए विभिन्न राजनैतिक दल भी मनमानी करने पर उतर आते हैं जिससे परिस्थितियां सँभालने के स्थान पर और उलझ जाती हैं. सांसदों की तरफ से और संसद की रक्षा मामलों की समिति की तरफ से जिस तरह से सेना द्वारा दी गयी जानकारी पर संतोष जताया गया था उसके बाद विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने मंगलवार के दिन डीजीएमओ की तरफ से इस मामले पर सांसदों को पूरी जानकारी देने के लिए एक बैठक बुलाई है. अच्छा होता कि इस बारे में सरकार ही सभी सांसदों या दलों के मुख्य सचेतकों को एक बैठक कर पूरी जानकारी दे देती जिससे सभी को पूरी बात भी पता लग जाती तथा इस पर होने वाली राजनीति पर पूरी तरह से रोक भी लग जाती.
जिस तरह से यह बात सामने आ रही है कि इससे पहले उप-सेनाध्यक्ष द्वारा जिस तरह से सांसदों को केवल सीमित जानकारी दी गई तथा इसके बारे में किसी भी सवाल का उत्तर नहीं दिया गया उसके बाद से ही रक्षा मामलों की संसदीय समिति और सांसदों में रोष था. इस समिति के अध्यक्ष बीसी खंडूरी और अन्य दलों के सांसदों में इस मुद्दे पर कहा सुनी भी हो गयी थी. निश्चित तौर पर यह गंभीर मामला है और इस पर किसी भी तरह की राजनीति की कोई जगह नहीं होनी चाहिए पर आज देश में हर स्तर पर राजनीति करने की जो परंपरा शुरू हो चुकी है उसमें अब कब और कहाँ राजनीति अपने पैर जमा ले यह कहा नहीं जा सकता है. रक्षा मामलों की संसदीय समिति भी अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण होती है और किन कारणों से इससे पूरी जानकारी नहीं बांटी गयी इस बात पर स्पष्टीकरण दिया जा सकता था पर देश के संविधान ने सांसदों को जिस तरह के विशेषाधिकार दिए हुए हैं उसमें उनको किसी भी जानकारी को पाने का पूरा अधिकार भी है और संभवतः इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा जब सीमित जानकारी रक्षा मामलों की समिति से साझा की गयी थी.
अब यदि विदेश मामलों की समिति जिसके अध्यक्ष कांग्रेस के शशि थरूर हैं उनके प्रयासों या फिर खुद सेना और विदेश मंत्रालय की तरफ से ही इस तरह की बात की गयी है जिसमें खुद डीजीएमओ पूरी बात सांसदों के सामने रखने वाले हैं तो उससे किसी का भी नुकसान नहीं होने वाला है क्योंकि आमतौर पर संसदीय समितियों में क्या होता है उसके बारे में पूरी जानकारी मीडिया तक नहीं पहुँचती है. इस समिति में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी हैं जिससे अब सेना की कार्यवाही के बारे में पूरी जानकारी मिलने के बाद आशा की जा सकती है कि इस मुद्दे पर राजनीति बंद हो जाएगी. सरकार को निश्चित तौर पर इस बारे में बात कर लाभ उठाने की छूट होती है पर जिस तरह से अभी से ही सरकार समर्थकों द्वारा इस बारे में बातें शुरू की गयी हैं तो उसके बाद से ही विपक्षियों के सरकार पर हमले बढ़ गए हैं जब सर्जिकल स्ट्राइक के बाद इस मुद्दे पर कई दिनों तक ख़ामोशी रही तो सरकार को भी अपने समर्थकों से चुप रहने के लिए कहना चाहिए था पर प्रचार को जन जन तक पहुँचाने के लिए सरकार की तरफ से शुरुवाती चुप्पी लगायी गयी जिसके बाद से ही मामला बिगड़ता चला गया. संसद को सब कुछ जानने का हक संविधान ने दिया है पर सरकार को भी अपनी ज़िम्मेदारियों को समझना चाहिए तथा विपक्ष के साथ देश को विश्वास में लेना चाहिए जिससे रक्षा से जुड़े मामलों में राजनीति के अवसरों को समाप्त किया जा सके.

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