विचारधाराओं की लड़ाई

देश में भाजपा के खिलाफ जिस तरह से सभी दल एकजुट होने की बातें कर रहे हैं वे अल्पावधि में भले ही कुछ लाभ दे जाएँ पर आने वाले समय में धरातल पर विचारधाराओं की लड़ाई में इन दलों को दीवालिया करने और चुनावी हार तक ले जाने वाले ही साबित होने वाले हैं। विरोध करने के लिए विरोध नहीं होना चाहिए क्योंकि देश ने पहले भी केवल सत्ता पाने के लिए किये जाने वाले बेमेल गठजोड़ों को १९७७ और १९८९ में देखा है। बेशक वह पीढ़ी आज अपनी राय दे पाने की स्थिति में नहीं हो पर सच्चाई बदल नहीं सकती है। नेहरू से लगाकर सोनिया तक कांग्रेस ने और ३७ वर्ष में अटल से लेकर शाह तक भाजपा ने अपनी विचारधाराओं का पोषण ही किया है। नेहरू और उसके बाद लोहिया के समाजवाद से आज का समाजवाद मेल नहीं खा रहा है तो डॉ अंबेडकर के शुरू किये गए दलित चेतना से कांशीराम तक होते हुए आज मायावती तक आने वाले सम्पूर्ण दलित विमर्श में आज दलित कहीं पीछे छूट गए हैं और सभी के लिए केवल सत्ता पाना महत्वपूर्ण हो चुका है। हर दल को मज़बूती से अपनी विचारधारा को ही पुष्ट करने के बारे में सोचना चाहिए और जिन मुद्दों पर बिना राजनैतिक द्वन्द और अंतर्विरोध के साथ चल सकने की क्षमता वहीं पर सत्ता सँभालने के बारे में सोचना चाहिए। आज ये दल जितना भाजपा को घेरने की कोशिशें करेंगें उसका उतना ही गुणात्मक लाभ भाजपा को मिलेगा क्योंकि इस तरह पाले खींचकर मैदान में उतरना भाजपा को सदैव सुहाता है। कांग्रेस के लिए यह आत्म मंथन का समय है क्योंकि उसके पास आज भी देश भर में कहीं मजबूत तो कहीं कमज़ोर संगठन मौजूद है इसलिए पूरे देश का परिदृश्य सोचकर उसे अपनी नीतियां बनानी होंगीं। लोकतंत्र में वैचारिक भिन्नता उसकी जीवंतता और सकारात्मक को दिखाता है। सत्ता के लालच में आज कितने कांग्रेसी और अन्य दलों के नेता सतत सत्ता के शिखर की तरफ बढ़ती भाजपा में जा चुके हैं इससे स्पष्ट हो जाता है कि आज की राजनीति में विचारधाराएं नेताओं के लिए मायने नहीं रखती हैं। देश के लिए बेहतर यही होगा कि अपने अपने प्रभाव और कार्य क्षेत्र में सभी राजनैतिक दल अपनी विचारधारा के अनुरूप लड़ाई लड़ने का काम करें भाजपा की केंद्र और राज्यों में सरकारों के जन विरोधी क़दमों का लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध करने की कोशिश करें। सत्ता जनता के बीच धूल फांककर मिलती है न कि जनता की आँखों में धूल झोंककर। सरकारों को काम करने दीजिये और मुद्दों के आधार पर उनका प्रभावी और सकारात्मक विरोध भी दर्ज़ कराना सीखिए। लोकतंत्र में जनता जनार्दन होती है वो कब किस पर रीझ जाये कोई नहीं जानता इसलिए हर मुद्दे पर राजनीति करने के स्थान पर खुद को जनहित से जुड़े कार्यों को जोड़ जनता की समस्याएं सुलझाने और उसका लाभ उठाकर स्वीकार्य बनने की कोशिश करनी चाहिए।

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