रेलवे संरक्षा की मूलभूत आवश्यकता

पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से देश में होने वाली विभिन्न रेल दुर्घटनाओं की जड़ में उपयुक्त रखरखाव का अभाव सामने आ रहा है उससे यही लगता है कि देश में सरकार, रेल मंत्रालय और रेलवे बोर्ड में कहीं न कहीं से सामंजस्य की व्यापक कमी हो गयी है. जिस देश में अब बड़े शहरों में मेट्रो परिचालन के बाद उसे अन्य शहरों तक बढ़ाये जाने की कोशिशें की जा रही हैं और उच्च तकनीक के मानदंड स्थापित करने वाली बुलेट ट्रेन की परिकल्पना पर काम शुरू किया जा चुका है वहां पर रेलवे के पास रख रखाव के लिए उपयुक्त व्यवस्था न होना पूरी व्यवस्था पर ही संदेह पैदा करती है. रेलवे की तरफ से अधिकांश सुरक्षा से जुड़े कामों को भी केवल गति नियंत्रित करके तब तक रोका जाता है जब तक कोई दुर्घटना नहीं हो जाती है. नई दिल्ली स्टेशन पर दो बार राजधानी ट्रेन के पटरी से उतरने के पीछे जो कारण बताये जा रहे हैं उनमें कंक्रीट के उन स्लीपरों की आयु पूरी होना मुख्य कारण है जिनके कमज़ोर होने से यह समस्या सामने आ रही है. यहाँ पर एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी सामने आता है कि १८५३ से लगातार चल रही भारतीय रेल के सामने इस तरह की स्थिति कभी भी नहीं आयी थी कि उसे केवल रखरखाव में लापरवाही के कारण दुर्घटनाओं को बुलाते हुए देखा गया हो ? पटरी के स्लीपरों को सात वर्ष की आयु पूरी करने के बाद इनकी सघन जाँच करके १० वर्षों की आयु पूरी होने से पहले ही उनको अपने नियमित रखरखाव के साथ बदलने की कोशिश करने का एक व्यापक कार्यक्रम आखिर रेलवे के पास क्यों नहीं है जिसके कारण देश की सबसे महत्वपूर्ण समझे जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस भी इस तरह से देश की राजधानी के मुख्य स्टेशन पर इस तरह से दुर्घटनाओं का शिकार हो रही है तो देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में रेलवे की आधारभूत संरचना का क्या हाल होगा यह तो सोचने का विषय है.
इतने बड़े देश में करोड़ों लोगों को रोज़ ही हज़ारों गाड़ियों में सफर कराना निश्चित तौर पर चुनौती भरा काम है और इस काम को भारतीय रेल ने अभी तक बहुत अच्छी तरह से किया भी है पर एकदम से यह नयी समस्या सामने आ रही है उसमें किसी न किसी की ज़िम्मेदारी तय की जानी ही चाहिए क्योंकि यह इतना हल्का मुद्दा नहीं है जिस पर गंभीरता से विचार ही न किया जाये. रेलवे को अपने नेटवर्क में विस्तार से पहले इस बात पर ध्यान देना ही होगा कि उसके मौजूदा नेटवर्क के सही और गुणवत्तापरक रखरखाव के लिए उसके पास धन, संसाधन और कुशल कर्मचारियों की व्यवस्था है या नहीं क्योंकि जब तक पहले से उपलब्ध नेटवर्क का सही दोहन नहीं किया जायेगा तब तक नेटवर्क को विस्तार करने का कोई लाभ नहीं मिलने वाला है. देश में रोज़ ही चलने वाली हज़ारों गाड़ियां यदि इसी तरह से जर्जर पटरियों पर जबरदस्ती दौड़ाई जाती रहीं तो आने वाले दिनों में रेल यात्रा दुःस्वप्न बनकर ही रह जाने वाली है जिसका सीधा असर रेलवे के राजस्व पर भी पड़ने वाला है. आज देश में तेज़ी से बढ़ते हुए रोड नेटवर्क के चलते शहरों की दूरी काम समय में तय की जा रही है तो ऐसे में आमलोग लगातार असुरक्षित होती रेलवे को विकल्प के रूप में कब तक चुनते रहेंगें यह भी सोचने का विषय है. रेलवे के पास अब बहुत कम समय बचा है क्योंकि उसे पहले ही बड़े शहरों के बीच हवाई परिवहन से कड़ी चुनौती मिलने लगी है जिसका अभी तक उसके पास कोई तोड़ नहीं है और आने वाले समय में यदि सड़क परिवहन की तरफ से उसके लिए ऐसी चुनौतियाँ पेश कर दी गयीं तो उसके लिए वर्तमान स्वरुप को बनाये रख पाना ही कठिन हो जायेगा.
तेज़ गति की और अधिक ट्रेन शुरू करने से पहले पटरियों गाड़ियों और स्टेशनों की वर्तमान क्षमता का भरपूर दोहन करने के बारे में सोचना आवश्यक है साथ ही यह भी आवश्यक है कि आज का भारत अंग्रेज़ों का भारत नहीं है क्योंकि अंग्रेज़ों ने अपने व्यावसायिक लाभ के लिए ही रेल नेटवर्क को बिछाया था जिससे उन्हें भारत की विविधता भरी सम्पदा को बंदरगाहों के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व तक व्यापार करने के लिए पहुँचाने में मदद मिल सके. आज रेल नेटवर्क को आपस में जोड़ने और पूर्व पश्चिम तथा उत्तर दक्षिण में पहले से उपलब्ध नेटवर्क को हर ५० किमी पर आपस में जोड़ने की आवश्यकता पर ध्यान देने की आवश्यकता है जैसे उदाहरण के तौर पर लखनऊ दिल्ली मार्ग को लें तो आज कानपूर और हरदोई होते हुए दो रास्ते हैं जिनमें आपस में बहुत काम स्थानों पर एक दूसरी जगह तक जाया जा सकता है. किसी एक मार्ग पर दुर्घटना होने या कोई अन्य समस्या होने पर उस मार्ग की अधिकांश ट्रेनों को निरस्त कर दिया जाता है और केवल अति महत्वपूर्ण ट्रेनों का सञ्चालन ही वैकल्पिक मार्ग से किया जाता है. यदि रेलवे इस रुट के दोनों मार्गों को काम से काम ४ जगह आपस में अच्छी तरह से जोड़ सके तो आने वाले समय में एक मार्ग पर किसी भी तरह की बाधा आने पर गाड़ियों को बीच बीच से दूसरे ट्रैक पर भेजकर परिचालन को सामान्य रखा जा सकता है और रेलवे की हानि को भी कम किया जा सकता है.
रेलवे बोर्ड और मंत्रालय को लोकतंत्र में बदलती हुई सरकारों की बातों को अवश्य ही ध्यान में रखना होगा पर उसकी तरफ से एक बात राजनैतिक तंत्र को स्पष्ट कर दी जानी चाहिए कि रखरखाव के लिए जो धन दिया जाना है उस पर किसी भी स्तर पर कोई कटौती नहीं की जा सकती है क्योंकि समस्या आने पर सरकार रेलमंत्री तो बदल देती है पर उसका असली खामियाज़ा अधिकारियों और अंत में रेलवे के साथ आमनागरिकों को ही भुगतना पड़ता है. आज रेलवे को बचाये रखने के लिए एक मिशन की तरह चलाये जाने की आवश्यकता है जिसके बिना यह आज की चुनौतियों को सँभाल पाने में पूरी तरह विफल ही साबित होने वाले है. रेलवे को अपने नेटवर्क पर समुचित ध्यान देने के साथ यात्रियों के लिए किराये को भी तर्क संगत रखने की दिशा में सोचना होगा जिससे रेलवे अपनी पुरानी स्थिति की तरफ लौट सके और यात्रियों को सुरक्षित यात्रा उपलब्ध हो सके.

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