राजनैतिक ध्रुवीकरण का औचित्य

पीएम मोदी पर हर मुद्दे पर लगातार सीधे हमले करने की विपक्षी दलों की नीति के चलते जहाँ वे अपनी स्थिति को मज़बूत करते जा रहे हैं वहीं विपक्षी दलों के सामने एक तरह से अपनी बात को जनता तक सही तरह से पहुँचाने का संकट सा उत्पन्न हो गया है. २४ घंटे चलते समाचार टीवी चैनल और उनका मोदी सरकार की तरफ बढ़ता झुकाव देश में एक ऐसी स्थिति पैदा कर रहा है जिसकी कल्पना कोई नहीं कर पा रहा है. निश्चित तौर पर पीएम मोदी में जनता से सीधा संवाद करने की खूबी मौजूद है पर इसके साथ ही वे जितनी तेज़ी से आगे बढ़कर सरकार और पार्टी का नेतृत्व करने को सजग राजते हैं उसका लाभ भी लगातार भाजपा को मिलता जा रहा है. इस पूरे प्रकरण में जो बात सबसे अहम् हो जाती है कि आखिर सही दिशा में हमले करने में सफल होते विपक्षी दल जनता के बीच अपनी स्वीकारता क्यों नहीं बढ़ा पा रहे हैं जबकि आज देश के हर वर्ग में किसी न किसी स्तर पर असंतोष पहले के मुक़ाबले कहीं और अधिक दिखाई दे रहा है. क्या कारण है कि विपक्षी दलों के हाथों में वे मुद्दे भी लम्बे समय तक नहीं टिक पा रहे हैं जिनका जनता से सीधा सरोकार है और उन पर ध्यान न दिए जाने से लगातार उन मुद्दों से जुड़े लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है ? ऐसी स्थिति में गैर एनडीए दलों को अपनी नीति पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि उनकी आज सीधे पीएम पर हमला करने की नीति का कोई विशेष लाभ दिखाई नहीं दे रहा है.
कभी अपने वोट बैंक के दम पर सौदेबाज़ी करने की सबसे मज़बूत स्थिति में होने के बाद भी बसपा प्रमुख मायावती ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके वोटबैंक का अधिकांश हिस्सा बिना किसी शोर शराबे के इस तरह से बिखर जायेगा और उनके पास यूपी जैसे महत्वपूर्ण राज्य में इतनी शक्ति भी नहीं बचेगी कि वे अपने दम पर खुद भी राज्यसभा तक पहुँच पाएं ? ऐसी स्थिति में उन्होंने दलितों के मुद्दे को हवा देते हुए राज्यसभा से इस्तीफ़ा देकर एक नया पैंतरा चला है जिसके बाद यूपी में एक बार फिर से ध्रुवीकरण की राजनीति को तौला जाने लगा है क्योंकि बिखरे हुए विपक्ष के लिए सीधे पीएम मोदी पर हमलवार होने से कोई परिणाम सामने आता नहीं दिखाई दे रहा है. जिस तरह से यह बात सामने आ रही है कि आदित्यनाथ सरकार के मंत्रियों के इस्तीफे से खाली होने वाली लोकसभा सीटों पर विपक्ष संयुक्त रूप से अपने प्रत्याशियों को उतारने की मंशा पर काम करना शुरू कर चुका है तो यह उसके लिये अच्छी शुरुवात हो सकती है पर फूलपुर से मायावती को चुनाव लड़ने के लिए मना पाना बहुत कठिन काम है और देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू की सीट से गंभीरता से चुनाव लड़कर विपक्ष इसे जीतकर एक सन्देश भी देना चाहता है. मायावती ने अधिकांश समय सीधे जनता का सामना करने और विभिन्न चुनावों को लड़ने के प्रति अनिच्छा को देखते हुए अभी यह कहना जल्दबाज़ी ही होगी कि वे इसके लिए राज़ी भी होंगी. संयुक्त विपक्ष इन चुनावों के बहाने से अपने २०१९ के संभावित विकल्पों को टटोलने की कोशिश करने में लग चुका है जिसके माध्यम से वह पीएम मोदी से टक्कर ले सके.
आज विभिन्न विफलताओं के बाद भी मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी दिखाई नहीं देती है जिससे संयुक्त रूप से काम करने वाले विपक्ष का सामना करने में उनको कुछ असुविधा भी हो सकती है पर वे और भाजपा के साथ संघ की ज़मीनी पहुँच होने के बाद उनके लिए अपनी बात को समाज के निचले स्तर तक पहुँचाना बहुत आसान है और यह काम उनकी तरफ से विभिन्न चुनावों में बहुत सफलता के साथ किया भी जा रहा है तो ऐसी परिस्थिति में अब विपक्ष को विभिन्न मुद्दों के साथ सीधे राज्यों की राजधानियों और दिल्ली में मोदी को केंद्र में रखकर प्रदर्शन करने के स्थान पर जिला तहसील तक अपनी पहुँच और पकड़ को मज़बूत करने के लिए स्थानीय समस्याओं के साथ खुद को जोड़ना होगा क्योंकि जब तक इन मुद्दों को सही ढंग से आगे नहीं बढ़ाया जायेगा और केवल हर बात के लिए पीएम मोदी को ही ज़िम्मेदार ठहराया जायेगा तो उससे उनकी नीतियों से असहमत होने के बाद भी वोटर उनसे दूर नहीं होना चाहेगा. विपक्ष को देशहित के मुद्दों पर अब और अधिक गंभीरता के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक गुण दोष के आधार पर मुद्दों पर चर्चा नहीं होगी तब तक जनता तक सही सन्देश भी नहीं पहुँचाया जा सकेगा. निश्चित तौर पर हमले के केंद्र में पीएम मोदी ही रहने वाले हैं पर हर बात के लिए उनको ज़िम्मेदार बताने की प्रवृत्ति से विपक्ष को छुटकारा पाना ही होगा.
देश के सर्वाधिक राज्यों में अपने संगठन के दम पर आज़ादी के बाद से मौजूद कांग्रेस के लिए भी अब ज़मीनी स्तर पर बहुत काम करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक राज्यों में सरकारों के काम काज की समीक्षा करने के बाद उनकी सही दिशा में आलोचना नहीं की जाएगी तब तक उसके जनता के बीच स्वीकार्यता को पाना मुश्किल हो जायेगा. आज की परिस्थिति में पूरे देश में कांग्रेस खुद ही अनिर्णय का शिकार बनी हुई है जिसका मुख्य कारण वहां नेताओं कि बढ़ती उम्र ही अधिक है क्योंकि पिछले दो दशकों में जब सोनिया गांधी ने खुद ही आगे बढ़कर पार्टी का नेतृत्व किया और बहुत ही विषम परिस्थितियों में अटल जैसे लोकप्रिय पीएम को भी चौंकाते हुए सत्ता से बाहर कर दिया था आज कांग्रेस में वह इच्छाशक्ति कहीं से भी नहीं दिखाई देती है. पीएम मोदी की लोकप्रियता से अधिक आज कांग्रेस की दिशाहीनता के चलते भी वे और मज़बूत होते जा रहे हैं. देश के हर राजनैतिक दल को अपने अनुसार काम करने की आज़ादी है पर आज २०१९ के चुनाव के लिए जिस तरह से बिहार मॉडल के महागठबंधन की बात की जा रही है उसमें बहुत कुछ इस महा गठबंधन के खिलाफ भी जा सकता है क्योंकि लालू जैसे विवादित नेताओं की राजनैतिक पकड़ के चलते उनको पूरी तरह से अनदेखा नहीं किया जा सकता है और उनको साथ रखने पर मोदी पूरी निर्ममता से इस गठबंधन पर हमले कर अपनी स्थिति को मज़बूत कर सकते हैं. सभी राजनैतिक दलों को अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में जनता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की तरफ बढ़ना चाहिए और जनता की समस्याओं को दूर करने के लिए सघर्ष की राह पकड़नी चाहिए जिससे वे सरकार पर दबाव बनाकर खुद की स्वीकार्यता को बढ़ाने का काम कर सकें.

 

(फोटो पीटीआई से साभार)

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