यूपी पुलिस -यथार्थ और सुधार

                         लगता है कि यूपी की अखिलेश सरकार ने केवल चेतावनियों के भरोसे ही सत्ता में ५ साल पूरे करने का मन बना लिया है तभी कभी मुलायम तो कभी खुद अखिलेश प्रदेश स्तरीय सेवाओं के विभिन्न कैडरों के लिए रोज़ ही कुछ न कुछ कहते रहते हैं अभी हाल ही में जिस तरह से अखिलेश ने यूपी पुलिस को सुधर जाने के लिए के बार फिर से चेतावनी जारी की है उससे तो यही लगता है कि कहीं का कहीं कुछ तो ऐसा है कि पूर्ण बहुमत वाली इस सरकार को प्रशासनिक हलकों में बहुल हल्के से ही लिया जा रहा है ? लखनऊ में बैठकर या किसी आम जनसभा में इस तरह से चेतावनियों का क्या असर पड़ सकता है यह सभी को दिखाई दे रहा है अभी तक जिस तरह से पुलिस पर समाज के हर वर्ग से उँगलियाँ उठाई जाती रहती हैं उसके बाद उससे लोगों की अपेक्षाएं समाप्त सी हो जाती हैं जबकि किसी भी कानून व्यवस्था से जुड़ी समस्या में केवल पुलिस के भरोसे ही विश्वास बहाली का काम पूरे देश में किया जाता है.
                         थाने स्तर पर होने वाली किसी गड़बड़ी के लिए क्या किसी आईजी स्तर के अधिकारी को ज़िम्मेदार माना जा सकता है जब कि थाने स्तर के फैसले लेने के लिए पूरे देश में सत्ताधारी दल के छुटभैये नेता पूरा दबाव बनाकर रखते हैं और अपने ज़िला या राज्य स्तरीय संपर्कों के माध्यम से थानों और कोतवाली में पूरी मनमानी करने की कोशिशें करने में लगे रहते हैं ऐसी परिस्थिति में यदि कोई पुलिस कर्मी दबाव में आकर कोई ग़लत काम कर देता है तो उसके लिए बड़े अधिकारियों को ज़िम्मेदार ठहराकर क्या हासिल किया जा सकता है ? पुलिस पर ऊँगली उठाने से पहले देश और प्रदेश के राजनेताओं को यह तय करना ही होगा कि सामान्य प्रशानिक कार्यों में इस तरह के राजनैतिक हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा क्योंकि तभी पुलिस सही दिशा में काम कर पाने में सफल हो सकेगी.
                         पुलिस कि इस तरह की कार्यप्रणाली पर अंकुश लगाने के साथ ही उनके लिए मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति के बारे में भी देश को सोचना ही होगा क्योंकि राजनैतिक हस्तक्षेप के चलते आज पुलिस को वे सामान्य सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं जो अन्य सरकारी सेवाओं के क्षेत्रों को आसानी से दी जाती हैं. कोई भी सुधार तब तक पूरे फल नहीं दे सकते हैं जब तक उनकी समस्याओं के बारे में पूरी तरह से विचार नहीं किया जायेगा. देश में लम्बे समय से केवल बातों में ही स्थान पाने वाले पुलिस सुधारों को लागू करने में आख़िर नेताओं को क्यों डर लगता है शायद इसलिए भी यदि पुलिस को पूरी छूट दे दी गयी और वह कानून के अनुसार काम करने लगी तो निचले स्तर की नेतागिरी में पुलिस का जो दुरूपयोग कर अपने कैडर को खुश रखने की प्रक्रिया को किस तरह से जारी रखा जा सकेगा ? यदि वास्तव में बदलाव की अपेक्षा है अब कम से कम सही दिशा में क़दम बढ़ाकर सुधारों की शुरुवात तो करनी ही चाहिए जिससे कम से कम ईमानदारी के साथ काम करने वाले पुलिस जनों को तो कुछ सुरक्षा का माहौल दिया जा सके.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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