यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ……?

                                 दिल्ली में एक छात्रा के साथ हुए अपराध के बारे में बहुत कुछ कहा सुना जायेगा और कुछ समय बाद इस घटना को भूलकर हम फिर से अपने काम में लग जायेंगें. पुरुष प्रधान भारतीय समाज में आख़िर ऐसी क्या कमी आ गयी है कि बहुत सारी कोशिशें करने के बाद भी आज देश के किसी भी हिस्से में महिलाएं और लड़कियां सुरक्षित हों और ऐसा हम दावे के साथ कह सकें ? क्या कारण हैं जिनके चलते हमारे समाज में ऐसी ग्रंथियां पनप रही हैं जिनको खोलने के कोई सूत्र हमें दिखाई नहीं देते हैं किन कारणों से हमारे आप जैसे दिखने वाले आम लोग अचानक ही किसी महिला को अकेले में पाकर उससे दुर्व्यवहार करने से नहीं चूकते हैं ? जिन महिलाओं के बारे में सबके सामने इज्ज़त से बात की जाती है निजी वार्तालाप में उनको उतनी इज्ज़त क्यों नहीं दी जाती है इस पूरे सामाजिक अंतर्द्वंद के लिए आख़िर किसको दोषी ठहराया जाये और इससे किस तरह से निपटा जाये आज यही बहस नहीं वरन कार्यवाही का मुद्दा होना चाहिए. किसी भी नारी के ख़िलाफ़ इस तरह के अपराध को रोकने के लिए पहली पाठशाला घर ही हो सकती है क्योंकि यदि हम अपने घरों में महिलाओं की इज्ज़त करना सीख लेंगें तो बाहर भी स्वतः अपनी आदत के अनुसार उनकी इज्ज़त करने में हमें ख़ुशी ही होगी.
             इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए जिस तरह से कुछ लोग महिलाओं के पहनावे, उनके अँधेरा होने के बाद बाद बाहर निकलने, समाज में बढ़ रही अनैतिकता को दोषी ठहराने में लगे हैं वह एक तरह से असली समस्या से आँखें मूंदना ही है क्योंकि कोई पहनावा अगर किसी आदमी को इतने नीचे गिरा सकता है तो पहनावे में नहीं आदमी में ही कमी है क्योंकि वही पहनावा आते जाते और लोगों ने भी देखा है पर उन्होंने क्या वैसा ही व्यवहार किया ? पहनावे को दोष देने से पुरुष की घटिया मानसिकता का ही प्रदर्शन होता है क्योंकि जब चारित्रिक मजबूती नहीं होगी तो किसी भारतीय परिधान में रहने वाली किसी युवती या महिला के साथ भी ऐसी ही घटना हो सकती है. देश की राजधानी में आधुनिक पहनावे पर इस बात का ठीकरा फोड़ा जाता है पर देश के गांवों में जहाँ भारतीय परिधान ही पहने जाते हैं क्या वहां पर ऐसी घटनाएँ नहीं होती हैं ? फिर महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों का ठीकरा भी महिलाओं के सर फोड़ने की यह गन्दी मानसिकता अब बदलनी चाहिए क्योंकि पहनावे को देखकर जिसके मन में ऐसा करने के विचार आते है वह किसी भी समाज में रहने लायक नहीं है और उनको मानसिक रोगी ही कहा जा सकता है. ऐसे लोगों की उनकी हरकतों से समय रहते पहचान की जानी चाहिए और उनको सुधारने के प्रयास निष्फल होने पर सजा भी देनी चाहिए. 
             देश के राजनैतिक तंत्र को इस समस्या के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं है क्योंकि सभी अपने वोट पक्के करने के लिए जुटे हुए हैं. केवल संसद में गुस्सा दिखाने से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता है जब तक महिलाओं के बारे में पूरे पुरुष समाज की सोच में बदलाव नहीं लाया जायेगा. क्या आज इस तरह की बढ़ती प्रवृत्ति के लिए हमारी सामाजिक परिस्थितियों पर नज़र डालने की आवश्यकता नहीं है पहले जब संयुक्त परिवार रहा करते थे तो हर सदस्य किसी न किसी समय किसी की नज़रों के सामने रहा करता था पर आज बड़े बड़े घर तो हैं पर काम काजी अभिभावकों ने अपने बच्चों के लिए जो सुख सुविधाएँ दे रखी हैं आज वे भी कहीं न कहीं से सामजिकता को समझने में बाधक बन जाती है. इस मामले में किसी पर दोषारोपण करने की जगह पूरी शिक्षा व्यवस्था को परिवर्तित करने की ज़रुरत है और साथ ही लडकियों को प्राथमिक शिक्षा के साथ ही इस तरह के अपराधों से बचने के उपाय बताना भी आवश्यक है क्योंकि जब कोई लड़की या महिला निडर होकर इस तरह के प्रयास करने वाले को जवाब देना सीख जाएगी तो घटनाएँ कम हो जायेंगीं. आते जाते हमें भी अपने आस पास की संदिग्ध हरकतों पर नज़र रखने की आदत बनानी ही होगी क्योंकि तभी हम ऐसी घटनाओं को भांप सकेंगें. केवल पुलिस और सरकारों के भरोसे हमारी जितनी सुरक्षा हो सकती है वह सभी को पता है तो अब हमें खुद ही सचेत होकर अपने समाज के बारे में सोचना ही होगा.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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