>भाजपा को संघ की सलाह

>जयपुर में संघ प्रमुख मोहन भगवत ने जिस तरह से भाजपा को यह सलाह दी कि उसे अपना उपचार ख़ुद ही करना होगा उससे लगता है कि संघ फिल हाल भाजपा के संकट को दूर से ही देखना चाहता है। हो सकता है कि संघ के स्तर पर अभी केवल विचार विमर्श ही चल रहा हो कि अवसर आने पर भाजपा को किस तरह से फिर से मज़बूत करना है ? यदि ठीक से देखा जाए तो भाजपा का प्रदर्शन इतना ख़राब भी नहीं रहा परन्तु मनमोहन सरकार के वापस लौट आने से पार्टी में हताशा अवश्य दिखाई दी थी। उस समय पार्टी को एकजुट रखने के प्रयास सही ढंग से नहीं किए गए। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष की भूमिका हर दल को निभानी पड़ती है कोई भी इससे अलग नहीं रह सकता है। भाजपा शासित कई राज्यों में सरकारें वापस लौट कर आयीं इसका मतलब यह है कि वहां के लोगों को उन सरकारों का काम काज ठीक ठाक लगा। केन्द्र में भाजपा अपने को कांग्रेस का मज़बूत विकल्प के रूप में नहीं दर्शा पाई और कुछ मनमोहन सरकार पर कहने लायक उसके पास कुछ ख़ास था भी नहीं जिसके चलते वहां पर उसका प्रदर्शन ख़राब रहा । सत्ता में आने पर हर एक दल में गुट बाज़ी बढ़ जाती है पर समय रहते उससे निपटने के उपाय किए जाते रहे तो सब ठीक रहता है वरना स्थिति विस्फोटक हो जाती है।
ऐसा कुछ भी नहीं कि कुछ असंतोष के स्वरों में भाजपा जैसा संगठन ख़त्म होने जा रहा है हाँ कुशल नेतृत्व से इसको सँभालने की आवश्यकता है क्योंकि मज़बूत लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष का होना देश के लिए ही शुभ होगा। अब देखना है कि भाजपा कब अपने घर के झगडों से मुक्त होकर वास्तव में विपक्षी दल कि भूमिका के लिए ख़ुद को तैयार कर पाती है या अपने एक संगठन को ख़त्म होते देख संघ ही इस मामले में दखल देने का मन बना लेता है।

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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