बैंकिंग सेवा और भर्तियाँ

                            एक रिपोर्ट के अनुसार जिस तरह से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में ५६ हज़ार पदों के रिक्त होने की बात सामने आई है उससे यही लगता है कि इन बैंकों द्वारा सरकार से मिली अनुमति के बाद भी भर्तियों में उस तरह की तेज़ी नहीं दिखाई जा रही है जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है. केंद्र सरकार ने भविष्य में अपनी अधिकांश योजनाओं से जनता तक पहुँचने वाले किसी भी तरह के धन का प्रवाह जिस तरह से बैंकों के माध्यम से चालू रखने की योजनायें बनायीं हैं उसके बाद बैंकों में सामान्य काम काज के अतिरक्त इस काम का दबाव भी और अधिक बढ़ना तय है पर बैंक जिस तरह से अपनी सेवाओं को सुधारने के लिए संकल्पित दिखाई देने चाहिए उनमें उसकी बहुत कमी भी दिखाई दे रही है. इस क्षेत्र में जिस तरह से प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता पड़ती है और उसको पूरा करने के लिए जिस तरह से इन्हें लगातार प्रयत्नशील रहना चाहिए उसमें ये बड़ी कोताही करते रहते हैं जिससे आम ग्राहकों को बैंकों के काम करवाने में बहुत समस्या होती रहती है और कम के बोझ से दबे इनके अधिकारियों और कर्मचारियों को झल्लाते हुए देश भर में कहीं भी देखा जा सकता है.
                           यह सही है कि इस तरह की नियुक्तियों के लिए सरकार हर बार बैंकों को निर्देशित नहीं कर सकती है क्योंकि उसके पास अन्य काम भी हैं और जब इन पदों को भरने के लिए एक व्यवस्था है तो उसको सही तरह से क्यों नहीं संचालित किया जा रहा है ? यदि बैंकों में आवश्यकता के अनुरूप अधिकारी और कर्मचारी होंगें तो उससे उसके कुल काम काज की गुणवत्ता में बहुत अधिक सुधार आ जायेगा क्योंकि अभी तक बैंकों से केवल बहुत कम लोगों का पाला पड़ा करता था पर जिस तरह से हर योजना में इसको जोड़ने का काम सरकार द्वारा किया जाने लगा है तो आने वाले समय में किसी भी तरह के वित्तीय लेन देन को इनके बिना कर पाना असम्भव हो जायेगा. सरकार जिस तरह से बैंकों के माध्यम से अभी तक चल रहे भले ही वह काले धन के प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिशें कर रही है उसके परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं और बड़े व्यापारियों ने बैंकों के माध्यम से अपने कारोबार को कुछ हद तक करना शुरू भी कर दिया है.
                          भविष्य में इन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सामने निजी क्षेत्र के बैंकों की तरफ़ से जो भी चुनौतियाँ आने वाली हैं यदि उनसे निपटने के लिए कुछ ठोस क़दम अभी से नहीं उठाये जायेंगें तो एक दिन अचानक किस तरह से इनके साथ प्रतिस्पर्धा की जा सकेगी ? आज निजी बैंक अपने लाभ के लिए केवल शहरी क्षेत्रों में ही अपनी शाखाएं खोलने का काम कर रहे हैं और जब उनका काम यहाँ पर जमने लगेगा तो वे तहसील मुख्यालयों की तरफ़ भी जाने के बारे में सोचना शुरू कर देंगें जिससे पहले से स्थापित बैंकों के लिए काम करना और भी कठिन हो जायेगा. अब समय है कि इस बारे में ठोस विचार कर इन बैंकों के काम काज को सुधारने के लिए आवश्यक संख्या में भर्तियों को नियमित रूप से करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इस बारे में एक नीति बनाकर पूरे वर्ष की ज़रूरतों को क्षेत्र के अनुसार पूरा करने पर ध्यान भी दिया जाना चाहिए. आज वह समय नहीं है कि आम व्यक्ति केवल सरकारी क्षेत्र के बैंकों के माध्यम से ही अपना काम करवाना चाहे क्योंकि कम भीड़ और बेहतर प्रबंधन के साथ निजी क्षेत्र के बैंकों ने शहरी क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए चुनौती पेश कर ही दी है.      
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