प्रीमियम ट्रेन और समस्या

सीमित रूप से आर्थिक रूप से सक्षम यात्रियों को राजधानी जैसी सुविधाओं से युक्त ट्रेन के संचालन के साथ बेहतर सेवाएं देने के उद्देश्य के साथ २०१३ में शुरू की गयी भारतीय रेलवे की प्रीमियम ट्रेन सेवा शुरुवाती परीक्षणों में बहुत सफल रही थी जिसके बाद केंद्र में सरकार बदलने के बाद उन नीतियों पर संभवतः पुनर्विचार किया गया कि रेलवे की आमदनी को बढ़ाने में इन प्रीमियम ट्रेनों का उपयोग किस तरह से किया जा सकता है. इस मामले में संभवतः रेल मंत्री के सामने केवल लाभ के आंकड़े ही प्रस्तुत किये गए जिससे उन्हें यह बात समझ में आयी कि विभिन्न मार्गों पर चलने वाली अन्य महत्वपूर्ण ट्रेनों में भी इस तरह की व्यवस्था को लागू करने से रेलवे की आमदनी को बिना अतिरिक्त संसाधनों के ही बढ़ाया जा सकता है. यह योजना सफल नहीं हो सकती है इस बात पर पहले से ही आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं पर सितंबर में सर्ज प्राइसिंग लागू होने के बाद जिस तरह से उच्च श्रेणियों में रेलवे को त्यौहारी सीजन के बावजूद आमदनी में मामूली बढ़त के साथ बड़ी संख्या में यात्रियों को खोना पड़ा है उसके बहुत ही दूरगामी परिणाम आ सकते हैं और छोटी दूरी तक यात्रा करने वाले यात्री हमेशा के लिए रेलवे से दूर भी जा सकते हैं.
इसे इस तरह से समझ जा सकता है कि यदि एक परिवार के पांच लोग किसी अवसर पर ५०० से ७०० किमी की यात्रा रेल से करना चाहते हैं तो सामान्य किराये में वे रेलवे को ही प्राथमिकता दिया करते थे पर सर्ज प्राइसिंग लागू होने के बाद उनका यह किराया निजी टैक्सी लेकर जाने से भी मंहगा पड़ जाता है जिसमें स्टेशन तक आने जाने और सामान उठाने आदि के खर्चे भी लगते हैं पर अपनी बुक की हुई टैक्सी से जहाँ यात्रा आसानी घर से घर तक की जा सकती है वहीं अपने सामान के बारे में भी अधिक चिंता नहीं करनी पड़ती है. इस तरह से एक बार यात्रियों का यह समूह यदि रेलवे से अलग होकर इस तरह की यात्राओं का आदी जो जाता है तो रेलवे के लिए उन्हें दोबारा अपने से जोड़ पाना भी आसान नहीं होने वाला है क्योंकि रेलवे की तरफ से जब तक इन किरायों को दोबारा तर्क संगत करने के बारे में सोचा जायेगा तब तक राजमार्गों पर दबाव बढ़ ही जाने वाला है. इससे जहाँ एक तरफ रेलवे को नुकसान होना है वहीं देश के पर्यवरण को भी बहुत नुकसान होने वाला है क्योंकि हज़ारों यात्रियों को एक साथ सफर पर ले जाने वाली रेल के यात्री भी सड़क मार्गों पर भीड़ बढ़ाते हुए नज़र आने वाले हैं जिससे पहले से ही दबाव को झेल रहे मार्गो की हालत और भी ख़राब ही होने वाली है.
अच्छा हो कि रेलवे अपनी इस नीति पर पुनर्विचार करे और आने वाले समय में हर ट्रेन में सर्ज प्राइसिंग लागू करने के स्थान पर केवल विशेष श्रेणियों की नयी ट्रेनों का सञ्चालन करे और आम यात्रियों से अनावश्यक रूप से खास किराया वसूलने और अपने घाटे को कम करने के तरीके से बच सके. यदि रेलवे यात्रियों को बहुत अच्छी सुविधाएँ देने में सफल होता है तो वह यात्रियों से तर्क संगत रूप में किराया लेने का हक़दार भी है पर जिस तरह से केवल आंकड़ों के हेरफेर से आमदनी को बढाए जाने की कोशिशें की जा रही है वे लंबे समय में रेलवे के आर्थिक हितों पर भी चोट करने वाली ही साबित होने वाली है. रेलवे इस बात के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे पर उसे यह भी ध्यान में रखना होगा कि रेलवे पूरे देश की रगों में दौड़ते हुए खून की तरह है जिससे सभी को जीवन मिलता है कहीं ऐसा न हो कि आमदनी बढ़ाने के चक्कर में रेलवे आम लोगों से बहुत दूर चली जाये और आने वाले समय में इसे फिर से पटरी पर लौटाना कठिन साबित हो जाये. आज जब खुद पीएम देश में बुलेट ट्रेन चलाये जाने के लिए बहुत गंभीर हैं तो रेलवे के बाकी हिस्से को अपने दम पर प्रचालन के योग्य बनाये रखना भी अपने आप में बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी ही साबित होने वाली है.

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