प्रतिद्वंदिता से संघर्ष तक

देश के हर हिस्से से कभी न कभी सत्ताधारी दल के नेताओं कार्यकर्ताओं द्वारा दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के विरोध के व्यक्तिगत या संस्थागत हमले के साथ आपसी संघर्ष में बदलने की ख़बरें आती ही रहती हैं. इस मामले में कुछ राज्यों में राजनैतिक हत्याओं का रिकॉर्ड काफी ख़राब है वहीं अधिकांश राज्यों में सत्ताधारी दल सत्ता के बलबूते विरोधियों पर दमन चक्र चलाने से पीछे नहीं रहते हैं. बंगाल से तृणमूल संसद सुदीप बंद्योपाध्याय को हिरासत में लिए जाने के बाद जिस तरह से विरोध स्वरुप पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भाजपा के राज्य कार्यालय के सामने उग्र प्रदर्शन किया और उसके बाद दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में हिंसक झड़प होने के भी समाचार हैं उससे यही लगता है कि हमारे लोकतंत्र में अभी भी नेताओं और दलों को यह समझने की आवश्यकता है कि किस तरह से समाज में रहकर अपने कर्तव्यों का अनुपालन किया जाये और किस तरह से लोकतंत्र में दूसरों को भी अभिव्यक्ति को समुचित स्थान दिया जाये ? देश में आज जिस तरह से राजनैतिक विचारधाराओं पर गंभीर विभाजन होता चला जा रहा है उसको रोकने के लिए कहीं न कहीं से शीर्ष स्तर से सभी दलों को कार्यवाही करने की आवश्यकता भी है.
बंगाल में चिटफण्ड घोटालों के चक्कर में सत्ताधारी तृणमूल सदैव से ही केंद्र सरकार के निशाने पर रही है और जिस तरह से भाजपा और तृणमूल दोनों दलों के शीर्ष नेताओं में दूरियां बढ़ रही हैं उनको देखते हुए अब कोई भी यह नहीं कह सकता है कि आने वाले समय में इनके कार्यकर्ताओं में पनप रही कटुता को कम किया जा सकता है. बंगाल, केरल, त्रिपुरा  और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में विरोध के स्वरों को हर तरह से दबाने की कोशिशें की जाती हैं जिनके फलस्वरूप कहीं न कहीं से सत्ताधारी दलों के कार्यकर्ताओं को भी यह सन्देश मिल जाता है कि भले ही उनके नेता कुछ भी कहते रहें पर इतने उग्र होने का पार्टी में लाभ भी मिल सकता है बस यहीं से लोकतंत्र में विरोध हिंसक हो जाता है और मरने-मारने की स्थिति स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है. ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए क्या अब देश के सभी राजनैतिक दलों को स्व-नियंत्रण पर ध्यान नहीं देना चाहिए जिससे आने वाले समय में राजनैतिक प्रतिद्वंदिता के चलते कार्यकर्ताओं और नेताओं पर इस तरह से होने वाले जानलेवा हमलों को पूरी तरह से रोका जा सके ?
ममता बनर्जी की तरफ से जिस तरह केंद्र की मोदी सरकार पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह सीबीआई और अन्य केंद्रीय एजेंसियों का दुरूपयोग तृणमूल नेताओं के दमन में कर रही है और उनके नेताओं को फ़र्ज़ी मामलों में फ़साने की कोशिशें कर रही है तो उसके बाद यह संघर्ष थमने का नाम नहीं लेने वाला है. केंद्रीय एजेंसियों का दुरूपयोग भारतीय राजनीति में नया नहीं है अक्सर केंद्र में सत्ता सँभालने वाला दल अपनी राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुरूप इन एजेंसियों का दुरूपयोग करता ही रहता है और भाजपा भी इसमें अलग साबित नहीं हो रही है. जो भी दोषी हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी ही चाहिए देश का यही मत है पर पहले की जांचों को रोककर किसी राज्य या दल विशेष के नेताओं के खिलाफ जांचों में तेज़ी आने से क्या इन एजेंसियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को नकारा जा सकता है ? इस तरह के मामलों में देश का हर राजनैतिक दल दोषी है क्योंकि उनके नेताओं द्वारा विरोधियों के प्रति उठाये जाने वाले क़दमों के बाद ही कार्यकर्ताओं के हौसले इतने बुलंद हो जाते हैं कि वे एक दूसरे पर जानलेवा हमले करने की नीचता तक उतर जाते हैं. अब देश को इस तरह की राजनीति में निर्दोषों को पीसने से बचने के लिए कड़े कदम उठाने ही होंगें जिससे सभी दलों के कार्यकर्ताओं को लोकतंत्र की मर्यादा के अनुरूप पूरी तरह से सुरक्षित किया जा सके.

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