नोटबंदी की तैयारियां ?

देश में नकदी के रूप में मौजूद काले धन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए जिस तरह से रिज़र्व बैंक के स्थान पर खुद पीएम मोदी ने घोषणा कर इस मामले में राजनैतिक बढ़त लेने की कोशिश की थी उसके सकारात्मक परिणाम तो लंबे समय में ही पता चल पाएँगें पर जिस तरह से यह घोषणा हड़बड़ी में की गयी उससे यही लगता है कि या तो सरकार को इस खबर के लीक होने का आदेश हो गया था या फिर उसने इतने बड़े परिवर्तन को भी हलके में लेकर इसके लिए कोई गंभीर तैयारी ही नहीं की थी इसलिए आज देश में आर्थिक माहौल एकदम से बेदम हुआ जा रहा है फिर भी वित्त मंत्री और पीएम मोदी पता नहीं किस विश्वास पर लगातार यह कह रहे हैं कि परिस्थितियां जल्दी ही सुधर जाने वाली हैं. देश से काला धन पूरी तरह से समाप्त हो इस बात से कोई भी असहमत नहीं है पर सरकार ने इतने महत्वपूर्ण कदम को किस तरह से उठाया यह समझने का विषय अवश्य ही है और आज देश के ६०% ग्रामीण क्षेत्रों में जो समस्याएं खडी हुई हैं उनसे निपटने के लिए अब सरकार की तरफ से रोज़ ही नए नए नियमों की घोषणा की जा रही है जो अब भारत सरकार के प्रति आम लोगों के भरोसे को कम कर रही है जो आज तक कभी भी इतने संकट में नहीं दिखाई दिया है. देश ने बहुत सारी विपरीत परिस्थितियों का भी बुरे से बुरे दौर में सामना किया है पर सामान्य समय में इस तरह की समस्या का कोई मतलब उन्हें समझ में नहीं आ रहा है.
एक दो अड़ियल राजनैतिक दलों को छोड़कर लगभग सभी दल इस मामले में सरकार का समर्थन कर चुके हैं पर सरकार ने काले धन के खुलासे के लिए जो तरीका अपनाया है उससे सबसे अधिक समस्या आम लोगों को ही हुई है देश के कुटीर उद्योग धंधे चौपट होने की कगार पर पहुँच चुके हैं क्योंकि नोटबंदी के बाद जिस डिजिटल व्यवस्था की बात सरकार करने में लगी है देश में भारत ब्रॉडबैंड की सम्पूर्ण, समग्र और प्रभावी पहुँच के बिना उसकी परिकल्पना केवल किताबों में ही की जा सकती है. मोदी सरकार की यह बड़ी चूक ही कही जाएगी कि उसकी तरफ से ज़मीनी हकीकत को समझे बिना ही इतना बड़ा कदम उठा लिया गया जिससे पूरे देश में आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है. अब जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है तो खुद भाजपा के अंदर से भी इस समस्या को कम करने की नीतियों पर उँगलियाँ उतनी शुरू हो चुकी हैं. बाबा रामदेव से लगाकर आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्र बाबू नायडू तक की तरफ से अब आम लोगों को होने वाली समस्याओं की तरफ ध्यान दिलाया जाने लगा है जबकि यही लोग पहले हर परिस्थिति में आमलोगों से कुछ दिनों तक परेशानियों को झेलने की बातें कर रहे थे. पांच हज़ार से अधिक रूपये जमा करने पर सरकार की तरफ से आये नए नियम की सब तरफ आलोचना शुरू हो चुकी है क्योंकि बहुत से लोगों ने बैंकों में लगने वाली भीड़ से बचने के लिए अभी तक अपने पुराने नोटों को जमा ही नहीं किया था और अब उन पर तरह तरह के प्रतिबन्ध लगाए जा रहे हैं.
बैंकों के कुछ सैकड़ा कर्मचारियों पर नोटबंदी की विफलता का ठीकरा फोड़ने के लिए लगता है सरकार ने पूरा मन बना लिया है क्योंकि जिस तरह से कुछ बैंकों में अनियमितताएं पाए जाने पर कार्यवाही शुरू की गयी है उसके बाद सरकार सभी बैंक कर्मियों को ही काला धन सफ़ेद में बदलने के लिए ज़िम्मेदार बताने में लग गयी है. २०१३ में आयकर विभाग कि तरफ से बैंकों की निगरानी की जो व्यवस्था शुरू की गयी थी आज उसका लाभ सरकार को मिल रहा है और जिस तरह से सीधे तौर पर छापों को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि सरकार इसके लिए प्रयासरत है तो यह भ्रम से अधिक कुछ भी नहीं है क्योंकि आज बैंकों के किसी भी खाते में अप्रत्याशित रूप से किये गए लेनदेन की जानकारी अनिवार्य रूप से आयकर विभाग को देना आवश्यक किया जा चुका है तो किस परिस्थिति में कोई बैंक इसे इतनी आसानी से छिपा सकता है ? खुद सरकार के अधिकारियों की तरफ से यह कहा जा रहा है कि बैंकों द्वारा दी गयी सूचना के आधार पर ही यह कार्यवाही की जा रही है पर सरकार के मंत्री इसे ऐसे प्रचारित कर रहे हैं जैसे यह सब वे खुद ही जाकर पकड़ रहे हों ? अब भी समय है सरकार को प्राथमिकता के आधार पर नोटबंदी से होने वाली समस्याओं से निपटने के लिए गंभीरता से कड़े कदम उठाने चाहिए जिससे आम लोगों में स्थायी भारत सरकार (अस्थायी मोदी सरकार नहीं) की गंभीरता के प्रति विश्वास का भाव बना रहे.

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