>नेताओं की बक बक और मुसलमान

>लगता है कि देश में कुछ नेताओं ने इतिहास से सबक न सीखने की कसम खा रखी है तभी तो ज़मीन से जुड़े मुलायम सिंह जैसे लोग भी कह रहे हैं कि कोर्ट के फैसले से मुसलमान अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं ? इन बातों का आज के सन्दर्भ में कोई मतलब नहीं रह जाता है क्योंकि इस फैसले के बाद जिस तरह से हमेशा ही आक्रामक रहने वाले आरएसएस और हिंदूवादी संगठनों ने जिस सहयोग और समरसता का परिचय दिया वह उनके बदले रुख़ को दर्शाता है पर आज भी मुलायम सिंह शायद देश की नब्ज़ भाँप पाने में असफल रहे हैं. उन्होंने जल्दबाज़ी में इस तरह का बयान जारी कर बेकार में सनसनी फ़ैलाने का काम ही किया है.
         आज पहली बार देश के बहुत से कम प्रसिद्द मुस्लिम संगठन यह कह रहे हैं कि अब यही सही समय है जब मुसलमानों को आगे आकर यह विवादित भूमि रामजन्मभूमि मंदिर के लिए सौंप देनी चाहिए क्योंकि उनका यह मानना है कि अगर आगे चलकर सर्वोच्च न्यायलय में भी यही स्थिति रही तो इस स्थल पर मंदिर ही बनेगा. ऐसी स्थिति में कुछ उदारवादी मुसलमान यह चाह रहे हैं कि वक्फ़ बोर्ड और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड अब इस मामले को यहीं पर ख़त्म कर दे जिससे समाज में सद्भाव बढे और जो लोग मुसलमानों के कट्टर होने की बातें करते हैं उन्हें भी करारा जवाब दिया जा सके. निश्चित तौर पर यदि मुस्लिम समाज से इस तरह की बातें सामने आ रही हैं तो वे देश के लिए अच्छा संकेत हैं क्योंकि अगर यह मंदिर सहयोग से बनता है तो यह मुसलमानों की उदारता और भाईचारे की नीति को आगे बढ़ाएगा और भविष्य में यदि फैसला नहीं हो पाता है तो कोर्ट के आने वाले फैसले से फिर से २४/ ३० सितम्बर जैसा खौफ़ लोगों के मन में रहेगा.
         जहाँ तक कुछ मुसलमानों के मन में यह शंका भी है कि अगर अयोध्या का मसला छोड़ दिया गया तो कल को मथुरा और काशी में ऐसे ही विवाद खड़े कर दिए जायेंगें तो १९९३ में बने धर्म स्थल विधेयक में इस बात की सुरक्षा दी गयी है कि केवल अयोध्या मामले को छोड़कर किसी भी अन्य धर्म स्थल की स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है. जब सरकार और कानून की तरफ से इतनी सुरक्षा की बात है तो फिर सभी पक्षों को सद्भाव दिखाना चाहिए. बातचीत या बिना अपील किये जो सद्भाव बनाये रखने की बात आज मुसलमानों की तरफ से उठ रही है उसके प्रति हिंदूवादी संगठनों को सद्भाव से ठन्डे दिमाग़ विचार करना चाहिए और किसी भी ऐसे वक्तव्य से परहेज़ करना चाहिए जो समाज में विद्वेष घोलता हो. निश्चित तौर पर यह बहुत बड़ा मामला है और मुसलमानों के बीच से अगर ऐसा कोई विचार आता है तो उसके लिए उन्हें मानसिक रूप से तैयार होने में भी बहुत समय लगने वाला है. इसलिए सभी को समरसता की बातें करनी चाहिए साथ ही ऐसे नेताओं से भी सचेत रहना चाहिए जो बिना बात के ही केवल सनसनी फ़ैलाने में ही विश्वास रखते हैं ? 
              

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