तलाशी की राजनीति

                               बोस्टन एअरपोर्ट पर यूपी के चर्चित मंत्री आज़म खान के साथ जिस तरह से तलाशी लेने का काम किया गया और उस पर वहां गए उन लोगों ने अपनी ज़बान नहीं खोली पर भारत आते ही जिस तरह से इसे मुसलमानों के स्वाभिमान से जोड़ने और खुद को दूसरे से बड़ा मुस्लिम लीडर मानने की राजनीति आख़िर शुरू ही हो गयी है उससे देश के नेताओं के मानसिक स्तर का ही पता चलता है. आज़म खान का यह आरोप कि यह सारा काम विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के कहने पर किया गया हो सकता है उतना ही बेतुका है जितना उनकी तलाशी लिया जाना ? क्या अमेरिका में अधिकारी भारत की तरह काम करते हैं क्योंकि अभी अमर सिंह आज़म पर यह आरोप लगा रहे हैं कि जया की लाल बत्ती आज़म के कहने पर ही उतारी गई थी ? पूरी दुनिया में कुछ कट्टरपंथी इस्लामी लड़ाके पूरे मुसलमानों को किस तरह से अलग थलग कर सकते हैं इसका इससे बड़ा उदाहरण और कुछ भी नहीं हो सकता है. अच्छा होता कि इस मसले पर ऐसी राजनीति के स्थान पर कम से कम भारत के मुसलमानों में यह आत्म मंथन शुरू होता कि आख़िर वे कौन से कारण हैं जो भारतीय मुसलमानों को भी अमेरिका की नज़रों में इराक़ और अफ़गानिस्तान के समकक्ष खड़ा करने का काम कर रहे हैं ?
                              जिस पीड़ा से आज़म खुद गुज़रे हैं अच्छा होता कि यूपी में कम से कम ऐसे मुद्दों को तलाशा जाता और मुसलमानों की छवि को ऐसा करने का प्रयास किया जाता कि हम भी यह कह सकते ही भले ही पूरी दुनिया में मुसलमानों की तरफ़ से चाहे जैसा व्यवहार किया जा रहा हो पर भारत और यूपी में ऐसा नहीं है ? मूल कारणों को खोजने के स्थान पर जिस तरह से इसे आम मुसलमान को अमेरिका के खिलाफ भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है उससे किसका भला होगा यह सभी जानते हैं. आख़िर क्या कारण हैं कि देश में कहीं पर भी हुए किसी भी आतंकी घटना के तार खंगालते खंगालते सुरक्षा एजेंसियों के हाथ आजमगढ़ तक अवश्य पहुँचते हैं ? क्या देश के अन्य भागों में मुसलमान नहीं रहते हैं और यदि रहते हैं तो वे इस तरह की गतिविधि में क्यों शामिल नहीं दिखाई देते हैं क्या आज तक देश के किसी राजनैतिक दल ने इस बात पर विचार करने की ज़रुरत भी समझी है ? मुसलमानों को पूरी दुनिया में बदनाम करने की कोशिशों में आख़िर कौन लगा हुआ है और उनके इन प्रयासों से आख़िर आम मुसलमान क्या पा रहा है ?
                             अच्छा होता कि केवल मीडिया के सामने बातें करने और चुनाव में मुसलमानों के वोट हासिल करने के स्थान पर उनकी वास्तविक रूप से सामजिक-आर्थिक बेहतरी के लिए ईमानदारी से कोशिशें शुरू की जातीं पर आज अपने को मुसलमानों के लोकतान्त्रिक ढंग से मज़बूत नेता साबित करने की होड़ में लगे हुए लोग जिस तरह से पूरी क़ौम के बारे में सोच ही नहीं पा रहे हैं उस स्थिति में मुसलमानों को इस घटिया राजनीति से बाहर कैसे निकाला जा सकता है ? देश में अन्य नागरिकों की तरह मुसलमानों के लिए भी सब कुछ है पर संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने के स्थान पर जब उनको केवल काल्पनिक भय दिखाकर उनके वोट हासिल करने में देश के राजनैतिक दल लगे हुए हैं उस स्थिति में उनके वास्तविक विकास के बारे में कौन सोचेगा ? अब समय है कि दुनिया के कई इस्लामी देशों से अधिक मुस्लिम आबादी वाले यूपी से कुछ शुरुवात होनी चाहिए पर नेता अपने हितों को साधने के लिए अच्छा करने से बचते हैं और उसके जाल में उलझकर मुसलमान आज भी अपने को पिछड़ा और ठगा हुआ सा ही पाते हैं ?          मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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0 Thoughts to “तलाशी की राजनीति”

  1. धर्म की राजनीती करने वाले ऐसे ही हो हल्ला मचाते है.