डिम्पल की दावेदारी

     यूपी में अखिलेश के सीएम पद सँभालने के बाद हो रहे कन्नौज उपचुनाव में जिस तरह से सपा प्रत्याशी और अखिलेश की पत्नी डिम्पल यादव के ख़िलाफ़ प्रदेश के विपक्ष ने घुटने टेक दिए हैं उसे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है. कांग्रेस ने तो अपनी राजनैतिक मजबूरियों के चलते पिछली बार भी यहाँ से अखिलेश के खिलाफ भी कोई प्रत्याशी नहीं उतारा था तो इस बार भी उसने वही बात कहकर अपने पल्ला झाड़ लिया पर जिस तरह से भाजपा और बसपा ने भी यहाँ डिम्पल को एक तरह से वाक ओवर ही दे दिया उसकी लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है. यह सही है कि सपा के हाथों हुई विधान सभा चुनावों की पराजय अभी ताज़ा है और प्रदेश में विपक्षी दल अभी उस सदमे से ही बाहर नहीं निकल पाए हैं ऐसे में उनसे किसी बड़े कदम और अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद भी नहीं की जा रही थी पर सरकार और मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत दिलचस्पी के कारण यह चुनाव जितना एक तरफ़ा होने जा रहा है उसे विपक्षियों ने और भी नीरस बना दिया है. जनता के सामने जीत के लिए जाने को ही लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है बल्कि किसी भी परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व को पूरा करने को ही सही मायने में उचित राजनीति कहा जा सकता है.
       केंद्र में सरकार चला रही कांग्रेस को अभी सपा की बहुत ज़रुरत है और २००९ में उसने सपा के महत्त्व और उसकी प्रासंगिकता को ध्यान में रखते हुए ही कन्नौज से कोई प्रत्याशी नहीं उतारा था पर अब उसे केंद्र में रोज़ ही बदलते समीकरणों से सपा की सरकार के अन्दर भी कभी भी ज़रुरत पड़ सकती है जिस बात को ध्यान में रखते हुए ही वह लड़ाई में नहीं आई है. भाजपा का जिस तरह से मनोबल टूटा हुआ है और उसने जिस व्यक्ति को अपना प्रत्याशी बताया वह नामांकन करने ही नहीं पहुंचा तो इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह इन चुनावों के लिए कितना सजग है ? इस बात के लिए स्थानीय निकाय चुनाव का बहाना बनाकर पार्टी अपनी इस कमी को छिपाने का प्रयास कर रही है. देश की राजनीति में बहुत बार ऐसा हुआ है कि किन्हीं विशेष परिस्थितयों में विपक्षियों ने भी किसी एक व्यक्ति के लिए अपने प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे हैं पर वहां पर उसे किसी विशेष अस्मिता या ज़रुरत से जोड़कर स्पष्टीकरण दिया गया था. कई बार असा भी हो जाता है कि किसी क्षेत्र के लोग अपने किसी व्यक्ति के बड़े पद पर पहुँचने के बाद उसका विरोध इसलिए नहीं करते हैं क्योंकि इससे अन्य लोगों में यह संदेश जा सकता है कि वे अपने क्षेत्र के लोगों का भी समर्थन नहीं करते हैं अपर यह भी लोकतंत्र में एक गलत परंपरा है और इसका किसी भी रूप में समर्थन नहीं किया जा सकता है. 
      सबसे अलग रुख बसपा का रहा जिसने अपने प्रत्याशी को यहाँ से न उतार कर अपने को राजनैतिक रूप के कमज़ोर साबित करने का कम किया है जबकि हक़ीकत ऐसी नहीं है क्योंकि आज बसपा ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसके पार सही मायने में ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ता मौजूद हैं और जिनके दम पर अगर वह यह चुनाव जीत नहीं पाती तो कम से कम सपा के लिए कुछ परेशानियाँ तो खड़ी कर ही सकती थी जिससे मुलायम अखिलेश और सपा के अन्य बड़े नेताओं को यहाँ पर अधिक समय देना ही पड़ता क्योंकि एक बार इसी तरह के एक चुनाव में राजबब्बर के हाथों डिम्पल अप्रत्याशित तरीके से चुनाव हार चुकी हैं तो उस स्थिति से बचने के लिए सपा को कड़ी मेहनत तो करनी ही पड़ती जिसे बसपा ने आसान कर दिया है. सरकार पर आरोप लगाना विपक्ष का हक़ है पर क्या सरकार के ख़िलाफ़ चुनाव न लड़कर कोई संदेश दिया भी जा सकता है ? कल को क्या इस तरह के बचकाना आरोप लगाकर बसपा २०१४ में लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ेगी या भाजपा भी सपा को प्रदेश में वाक ओवर ही दे देगी ? शायद यह सब लोकतंत्र को अपनी बपौती समझने के कारण उपजने वाली समस्याएं है क्योंकि हारे हुए दल एक और चुनाव में अपने को निश्चित तौर पर हारा हुआ देखने के लिए मानसिक स्तर पर भी तैयार नहीं है और लोकतंत्र के लिए इसे कहीं से भी अच्छा नहीं कहा जा सकता है.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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