टोपी की टपोरी राजनीति

                                               देश के नेताओं के पास लगता है कि मुद्दों की कमी हो गयी है या फिर वे केवल उन मुद्दों पर ही ध्यान देना चाहते हैं जिनके माध्यम से उनके कुछ वोट ही पक्के होते हैं ? भोपाल में ईद के मौके पर आयोजित एक समारोह में जिस तरह से फ़िल्म कलाकार रज़ा मुराद ने टोपी का बखान किया और उस मंच पर बैठे हुए लोगों के सामने ही अप्रत्यक्ष रूप से नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा उससे के बार फिर से मोदी और शिवराज चौहान के बीच कुछ लोगों को मतभेद देखने का अवसर मिल गया. यह सही है कि मोदी ने एक समरोह में मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया था जिस बात पर भी उस समय काफी बखेड़ा हुआ था. आज देश और समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह कब इन नेताओं के चश्में से दुनिया देखना बंद करेगा क्योंकि इन नेताओं के चश्मे का रंग समय के अनुसार बदलता जाता है और वे भले ही किसी भी रंग की टोपी पहने जनता को हर अवसर पर टोपी पहनाने से वे बाज़ नहीं आते हैं ? विडंबना है कि जिस टोपी को पहन कर शिवराज को कुछ वोटों की आस जगती है वहीं उसी टोपी से मोदी को उनके कुछ वोटों के कट जाने का डर लगता है.
                                            रज़ा मुराद की इस बात में तो काफ़ी दम है कि किसी भी व्यक्ति के टोपी या तिलक लगा लेने से उनके मज़हब पर कोई अंतर नहीं पड़ता है और भारत में जहाँ आम भारतीय मानसिकता अपने आस-पास के लोगों से मिलजुल कर रहना ही सिखाती है आज भी देश के हर कोने में उसके ढेरों उदाहरण मिल जाते हैं पर समस्या तब खड़ी होने लगती है जब नेताओं द्वारा इस तरह से दिखावे के लिए कुछ किया जाने लगता है जिसके बार से वह मसला किसी दूसरी तरफ़ ही मुड़ जाता है हर नेता यही चाहता है कि उसे किसी भी बहाने से कुछ वोट मिलते रहें भले ही वे बहाने समाज में वैमनस्यता बढ़ाने का ही काम करने से न चूकते हों ? आज भी देश के आम हिन्दू मुस्लिम एक दूसरे को उनके त्योहारों पर बधाईयाँ देने से नहीं चूकते हैं और फ़िल्म कलाकारों द्वारा यदि हर तरह के विविधता भरे रोल न किये जाएँ तो शायद उनका फ़िल्म उद्योग में टिक पाना ही असंभव हो जाए फिर जब समाज के उन स्तरों पर इस तरह से लाभ उठाने की बातें नहीं होती हैं तो केवल नेताओं के बहकावे में आकर समाज का विभाजन कहाँ तक उचित है ?
                                       इस मसले के बाद सोशल मीडिया से लगाकर हर जगह पर अब टोपी पर चर्चा शुरू होगी पर उस टोपी से समाज को नेता जो टोपी पहना देंगें उसे उतारना मुश्किल ही होगा क्योंकि किसी नेता के लिए टोपी पहनना या तिलक लगाना केवल एक सद्भाव का माध्यम ही हो सकता है पर उससे वास्तव में समाज में कितना सद्भाव फैलता है यह कोई नहीं जान पाता है ? आज समाज को यह सीखना ही होगा कि धर्म हर भारतीय का व्यक्तिगत मामला है और नेताओं को उसे अपने धर्म में अनुचित प्रवेश को रोकने का प्रयास हर स्तर पर करना ही होगा वर्ना जिस तरह से ये धार्मिक भावनाओं को भड़का कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं वह समाज के लिए एक बड़ा ख़तरा ही है. आम भारतीयों जिनमें हिन्दू-मुसलमान और अन्य सभी धर्मों के लोग शामिल हैं दूसरे के धर्मों और मान्यताओं का पूरा संम्मान किया करते हैं पर जिस तरह से सामाजिक सद्भाव के मसलों में कुछ लोग धर्म के केवल कुछ अंशों की व्याख्या करने लगते हैं तो उससे समस्या उत्पन्न हो जाती है. अब यह समाज का ही कर्तव्य है कि वह इन नेताओं से बचे क्योंकि किसी भी सार्वजनिक पद पर पहुंचा हुआ कोई भी व्यक्ति पूरे प्रदेश या देश का प्रतिनिधित्व करता है और उसे केवल एक समूह विशेष के नेता के रूप में देखने से समस्या कम नहीं होती वरन बढ़ती ही है.         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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0 Thoughts to “टोपी की टपोरी राजनीति”

  1. ये नेता ऐसे बयान इसीलिए देते है ताकि इन्हें पता है की मतदाता बेवकूफ है और इनका ध्यान असली मुद्दे से आसानी से भटकाया जा सकता है.अब बारी मतदाताओ की है की दिखा दे की वो अकल्मन्द है और असली बॉस कौन है.