>टिकट की समस्या…?

>जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारतीय रेल अपने आप में बहुत ही गौरवशाली है पर आज कल जिस तरह से इन्टरनेट टिकट के माध्यम से आम जनता के हक को मारा जा रहा है वह जानते हुए भी कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रहा है । हालाँकि ये सारी समस्याएँ बहुत पुरानी हैं फिर भी वर्तमान रेल मंत्री ममता बनर्जी की दिलचस्पी केवल बंगाल में ही होने से मंत्रालय के काम काज पर असर बहुत जल्द ही पड़ने वाला है।
वर्तमान में सारा देश छुट्टियों के मूड में है और जिस तरह से लोग घूमने जाते हैं उसी तरह से वापस भी आना चाहते हैं। आज कल ट्रेन में एक एक सीट के लिए मारा मारी मची हुई है और कोई भी देखने वाला नही है ? जनता को दी गई सुविधाओं का चंद लोग किस तरह से फायदा उठाते हैं यह हम सभी जानते हैं। तत्काल सेवा तो आज कल एक मज़ाक ही बनी हुई है वास्तव में कितने लोग इस सेवा का आपातकालीन प्रयोग कर पाते है इसके आंकडे अभी भी किसी के पास नहीं हैं। एक ऐसी सेवा जो लोगों को कुछ अधिक पैसे देकर सफर करने का अवसर प्रदान करती थी अब पूरी तरह से कुछ लोगों के चंगुल में फँसी हुई है। जब आम आदमी को इस बात का कोई लाभ नहीं मिलना है तो अच्छा ही हो कि भ्रष्टाचार बढ़ाने वाली इस योजना पर फिर से विचार किया जाए। मंत्रालय को समय रहते ऐसा तंत्र विकसित करना ही होगा जो प्रतीक्षा सूची को देख कर विशेष गाड़ियां चलने के आंकड़े समय पर दे सके क्योंकि आनन फानन में चलायी गई गाड़ियों के डिब्बे यात्रियों के लिए समस्या बढ़ाते रहते हैं।
ममता जी को भी ध्यान देना होगा कि अब उनकी प्राथमिकता केवल बंगाल नहीं हो सकती वे जन नेता हैं और जन नेता अपने स्वार्थ को नहीं देखते हैं। यदि उनके पास इस भारी भरकम मंत्रालय को चलाने का समय नहीं है तो अपने किसी सांसद को यह ज़िम्मेदारी सौंप कर स्वयं पार्टी को ही समय देना चाहिए। रेलवे बोर्ड एक ऐसा सफ़ेद हाथी है जो कुछ ठोस सुझाव कभी भी नहीं दे पाता है और इसके सदस्य बहुत ही राजसी ठाठ के साथ सफर करते मिल जायेंगें। आज मंत्रालय को आवश्यकता है कुछ सख्त कदम उठाने की जिससे रेल का सफर आरामदायक बन सके और हम भी रेलवे का ध्यान रखना सीखें.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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  1. >रेलवे में हर जगह दलालों का बोलबाला है चाहे टिकट आरक्षण हो या सामान बुक कराना ! हर जगह दलाल अपनी पैठ जमाए बैठे है | रेलवे के माल गोदामों में तो बिना दलालों के काम करवाना बहुत मुश्किल है

  2. >वर्ग विभाजित समाज व्यवस्था में रेलेवे दलालो को इसलिए रखता है ताकि व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह को टाला जा सके। इस व्यवस्था में जनता को तो पिसना ही है। इस में दलालो का दोष क्या है। आप ने व्यंग्य के लिए गलत विषय चुन लिया। व्यंग्य करना था तो प्रणाली पर करते। आप के व्यंग्य ने व्यवस्था के नंगे सच को ढ़क दिया है। और दलालो को निशाना बनाया है।देश के दलालो की कुल संख्या में से आधे से अधिक की आय तो साधारण क्लर्क से अधिक नहीं है। वे हास्य का विषय हो सकते हैं व्यंग्य का नहीं। आप का आलेख दलाल बिरादरी के लिए बहुत ही अपमान जनक है। यह तो अभी हिन्दी ब्लाग जगत में दलाल पाठक इने गिने ही हैं और वे भी मित्र ही हैं। मैं ने भी आप के इस आलेख का किसी दलाल मित्र से उल्लेख नहीं किया है। इस आलेख के आधार पर कोई भी सिरफिरा दलाल मीडिया में सुर्खियाँप्राप्त करने के चक्कर में आप के विरुद्ध देश की किसी भी अदालत में फौजदारी मुकदमा कर सकता है। मौजूदा कानूनों के अंतर्गत इस मुकदमे में सजा भी हो सकती है। ऐसा हो जाने पर यह हो सकता है, कि हम पूरी कोशिश कर के उस में कोई बचाव का मार्ग निकाल लें, लेकिन वह तो मुकदमे के दौरान ही निकलेगा। जैसी हमारी न्याय व्यवस्था है उस में मुकदमा कितने बरस में समाप्त होगा कहा नहीं जा सकता। मुकदमा लड़ने की प्रक्रिया इतनी कष्ट दायक है कि कभी-कभी सजा भुगत लेना बेहतर लगने लगता है। एक दोस्त और बड़े भाई और दोस्त की हैसियत से इतना निवेदन कर रहा हूँ कि कम से कम इस पोस्ट को हटा लें। जिस से आगे कोई इसे सबूत बना कर व्यर्थ परेशानी खड़ा न करे।आप का यह आलेख व्यंग्य भी नहीं है, आलोचना है, जो तथ्य परक नहीं। यह दलाल समुदाय के प्रति अपमानकारक भी है। मैं अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत लोगों को परेशान होते देख चुका हूँ। प्रभाष जोशी पिछले साल तक कोटा पेशियों पर आते रहे, करीब दस साल तक। पर वे व्यवसायिक पत्रकार हैं। उन्हें आय की या खर्चे की कोई परेशानी नहीं हुई। मामला आपसी राजीनामे से निपटा। मुझे लगा कि आप यह लक्जरी नहीं भुगत सकते। अधिक कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूँ।

  3. >दिनेशजी की राय से सहमत हैं।

  4. >रेल में निठल्लों कीरेल के बाहर दल्लों कीबल्ले बल्ले