चुनाव और अन्ना

           अच्छा ही हुआ कि अन्ना हजारे ने देश के कुछ राजनैतिक दलों के हाथों का खिलौना बनने से इनकार कर दिया है जिससे उनकी और उनके भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आन्दोलन की धार आगे के लिए बची रहेगी. जिस तरह से अन्ना के आन्दोलन से कुछ राजनैतिक दल और लोग केवल अपने स्वार्थ के लिए जुड़ गए थे उनको अन्ना के इस कदम से बहुत निराशा होने वाली है. यह सही है कि अन्ना ने अपने आन्दोलन से देश की जनता के सामने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की शक्ति का एहसास ज़रूर करा दिया है पर उनके इस आन्दोलन का जिस तरह से स्वार्थी लोगों ने लाभ उठाना शुरू किया उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती है. अन्ना के सामने कोई चुनौती नहीं थी क्योंकि उनके मन में जो संकल्प है उसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता है पर जिस तरह से कुछ लोगों ने पूरे देश को केवल दिल्ली ही समझ रखा है उससे उनके आन्दोलन को बहुत बड़ा नुकसान होने वाला था पर अन्ना के इस कदम से देश को ज़रूर लाभ होने वाला है. भ्रष्टाचार आज देश में स्थायी भाव बन चुका है कोई भी दल इस बात से इनकार नहीं कर सकता क्योंकि सत्ता तक पहुँचते ही सभी दल एक जैसा व्यवहार करने लगते हैं इसलिए विरोध भ्रष्टाचार का होना चाहिए न कि दल का ? उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का विरोध करके अन्ना को क्या हासिल होने वाला था शायद यह उन्हें पता चल गया और उन्होंने अपने कदम रोक लिए.
     अन्ना के आन्दोलन के दिल्ली और टी वी न्यूज़ तक सिमटने से जो होने वाला था वह हो चुका है इस आन्दोलन से आम लोगों का पूरे देश में कितना जुड़ाव हुआ यह कहना मुश्किल है पर आम लोगों ने अन्ना की बातों को बहुत सराहा था. किसी भी स्तर पर दिल्ली में अनशन करना तो आसान है पर उसे एक आन्दोलन के रूप में पूरे देश में पहुंचा पाना बहुत मुश्किल है. जिस तरह से अन्ना ने ख़ुद या अपनी टीम के दबाव में ५ राज्यों में कांग्रेस के ख़िलाफ़ प्रचार करने की बात कहीं थी उसकी कोई ज़रुरत नहीं थी क्योंकि जब तक अन्ना के पास इस आन्दोलन की ऊर्जा को सँभालने वाले मज़बूत लोग नहीं होंगें तब तक पूरे देश में इसे संभाल पाना मुश्किल ही होगा ? टीवी पर आन्दोलन जितना बड़ा दिखाई देता था वास्तव में वह पूरी ऊर्जा के साथ पूरे देश में नहीं दिखाई दिया उसके पीछे कहीं न कहीं से टीम अन्ना के कुछ लोगों की महत्वकांक्षाएं या निजी स्वार्थ आड़े आ गए और साथ ही अन्ना ने जिस तरह से देश के राजनेताओं पर भरोसा किया उससे भी कुछ हासिल नहीं हो पाया क्योंकि देश के नेता अब किसी के भरसे लायक रह ही नहीं गए हैं ?
    यह सही है कि अन्ना की देश को बहुत ज़रुरत है और उनके स्वस्थ रहने से उनके पूरे आन्दोलन पर गहरा असर पड़ने वाला है पर क्या यही बात उनकी टीम के अन्य लोग समझना चाह रहे हैं ? एक हिसार की जीत को इन लोगों ने अपनी जीत बताया जबकि वह कुलदीप विश्नोई और भजनलाल के परिवार की व्यक्तिगत जीत थी पर जब रतिया की सीट पर कंग्रेस ने २९ साल बाद कब्ज़ा जमाया तो कोई उस हार को अपने सर लेने को तैयार नहीं दिखा ? आज देश को एक मज़बूत और ईमानदार राजनैतिक तंत्र की आवश्यकता है पर साथ ही एक अन्ना जैसे आन्दोलन की भी उतनी ही आवश्यकता है जो समय समय पर भ्रष्ट हो रहे तंत्र की खामियों से जनता को अवगत करने की क्षमता रखता हो. अगर अब अन्ना के काम को देश के लिए हमेशा के लिए चलाना है तो उनकी टीम को यह समझना ही होगा कि इस आन्दोलन को किसी दल /सरकार के ख़िलाफ़ करने के स्थान पर भ्रष्टाचार और अनीति के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए तैयार किया जाना चाहिए और इससे उन लोगों को जोड़ा जाना चाहिए जो किसी भी राजनैतिक दल से संपर्क न रखते हों और अपने क्षेत्र में ईमानदारी से काम कर रहे हो.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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