चीन सीमा पर घुसपैठ

                                                                   चीन से लगती हुई भारतीय सीमा में अचानक से ही लद्दाख, उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक जिस तरह से घुसपैठ की घटनाओं में वृद्धि हुई है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में इस बात पर चीन की तरफ से ऐसा ही रुख अपनाया जाता रहेगा. चीन भारत का ऐसा पडोसी है जो पाकिस्तान की तरह हर समय एक सीमा तक आक्रामक तो रहता है पर उसके साथ हर विवाद कुछ दिनों तक सुर्ख़ियों में रहने के बाद कुछ समय के लिए ठंडा पड़ जाने देता है. भारतीय पक्ष के लिए सबसे कठिन काम यह है कि चीन की तरफ से तिब्बत वाले क्षेत्र से उसके लिए भारतीय सीमा का अतिक्रमण करना आसान है जबकि भारतीय क्षेत्र से इन स्थानों तक पहुंचना आज भी बहुत ही मुश्किल है. हालांकि चीन की तरफ से आसन्न इस खतरे को भांपते हुए पिछले कुछ वर्षों से भारत ने अपने रुख में बदलाव करते हुए इन सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी पहुँच को बढ़ाना शुरू किया है जिसे जानकर भी चीनी घुसपैठ और अधिक होती जा रही है.
                                                  ऐसा नहीं है कि चीन का केवल भारत के साथ ही इस तरह का विवाद चल रहा है वह अपने सभी पड़ोसियों के साथ किसी न किसी स्तर पर सीमा विवाद को ज़िंदा रखे हुए है पर कहीं भी वह इस मुद्दे पर बहुत आक्रामक नहीं दिखाई देता है और इन विवादों को बनाये रखने के लिए इस तरह कि हरकतें एक नीति के तहत ही करता रहता है. भारत की तरफ से जो भी प्रयास शुरू किये गए हैं उनको देखते हुए अब सीमा पर चौकसी बढ़ाये जाने के साथ पूरे सुरक्षा परिवेश को बेहतर बनाये जाने के लिए शुरू किये गए महत्वपूर्ण कामों को समयबद्ध तरीके से पूर्ण करने के साथ अपनी सीमाओं को मज़बूत किया जा सकता है. आज भी लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के साथ अरुणाचल प्रदेश के साथ लगती दुर्गम सीमा तक पहुँच पाना भारत के लिए कठिन है क्योंकि अधिकांश पहाड़ी ज़िलों में वर्षा के कारण हर वर्ष ही सड़कों के नेटवर्क को बहुत नुकसान पहुँचता रहता है और पूरे वर्ष तक कामकर पाने की स्थितियां न होने के कारण काम में तेज़ी भी नहीं आ पाती है.
                                 अब इस मुद्दे पर कांग्रेस को हर बार घेरने वाली भाजपा सरकार बना चुकी है और उसने अपने चुनावी अभियान में कुछ इस तरह का अतिवादी माहौल बना दिया था कि जैसे उसके सत्ता सँभालते ही पाक और चीन एकदम से सीधे हो जायेंगें तो अब उसके पास भी कहने के लिए कुछ भी शेष नहीं है. सीमा और सुरक्षा का मामला ऐसा है कि इस पर देश के राजनेताओं को किसी भी तरह की राजनीति करने से बचना चाहिए पर इस बार के चुनावों में पूरी भाजपा ने मोदी के अतिवादी रुख पर चलते हुए अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर जमकर राजनीति की और यह उन्हें भी पता है कि सीमा पार से होने वाली इन गतिविधियों को रोक पाना इतना आसान भी नहीं है. अच्छा है कि सीमित संख्या में सिमटे हुए विपक्ष ने भाजपा की तरह इस मुद्दे पर घटिया राजनीति की शुरुवात नहीं की है वर्ना अनावश्यक रूप से देश में इस मुद्दे पर आक्रोश बढ़ सकता है. आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी देश के राजनैतिक चरित्र में उन गुणों का समावेश नहीं हो पाया है जो देश के हितों को दलीय राजनीति से दूर रखकर सोच सकें जो कि बहुत बड़ा दुर्भाग्य ही है.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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