>चाँद के पार चलो…

>४० वर्ष पूर्व जब आज के ही दिन मनुष्य के कदम पहली बार चाँद पर पड़े थे तो मानवता ने इस उपलब्धि को बहुत बड़ा माना था। निश्चित तौर पर मनुष्य के खोजी भाव ने इतने सारे रहस्यों पर से परदा उठाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। आज ४० वर्षों के बाद भारत ने भी चाँद को छूने की एक कोशिश तो कर ही ली और काफी हद तक हम इसमें सफल भी रहे। प्राचीन समय की अवधारणाएं आज भी उतनी ही सच मानी जाती हैं जितनी कि तब मानी जाती थीं। हमारी जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ज़रूर से हमें नए रहस्यों पर से परदा उठाने के लिए प्रेरित किया। वैज्ञानिक उपलब्धियां सारी मानवता की साझी ही होती हैं पर कुछ देश अपने को सबसे आगे दिखाने के लिए अपने अर्जित ज्ञान को बाँटना नहीं चाहते। हालाँकि मनुष्य के मन में अच्छा बुरा सदैव ही रहता है पर सदैव बुरा ही तो नहीं होता। ज्ञान को जितना बाँट दिया जाए वह उतना ही फैल जाता है और आगे चलकर मिलकर नए शोधों को जन्म देता है।
आज हम सभी मानवता के उस छोटे से कदम को याद करते हुए आगे और भी बहुत से विकास की आशा तो कर ही सकते हैं.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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