घाटी की आवश्यकता

देश की आंतरिक राजनीति में भले ही कश्मीर मुद्दा सदैव गरम रहता हो पर सत्ता में तीन वर्ष पूरे कर रहे पीएम मोदी को अब यह अच्छे से समझ आ गया है कि इस मुद्दे पर राजनीति बहुत नुकसान कर सकती है. अभी तक कश्मीर में केवल विपक्ष की भूमिका तक सीमित भाजपा अपनी बात को खुलकर कहने से परहेज़ नहीं करती थी अब सत्ता में होने पर उसे कश्मीर में कांग्रेस, नेशनल कॉनफेरेन्स और पीडीपी की राजनैतिक मजबूरियां समझ आने लगी हैं. पिछले कई वर्षों से घाटी में गर्मियों का मौसम समस्याओं को लेकर ही आता रहा है जिससे शांति बहाली की अधिकांश कोशिशें भी कमज़ोर होती दिखाई देती हैं इस परिस्थिति से निपटने के लिए अब केंद्र को सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के साथ बात करनी चाहिए और अच्छा हो कि कश्मीर के बुद्धिजीवियों से सरकार सीधे संवाद स्थापित करे। यह सब उतना आसान नहीं है जितना लगता है क्योंकि कई वर्षों बाद अब आतंकियों की तरफ से राजनैतिक कार्यकर्ताओं को एक बार फिर से निशाने पर लिया जाने लगा है. घाटी के संवेदनशील मसले पर सभी राजनैतिक दलों और उनके नेताओं को बयान देने में उचित संयम बरतना चाहिए क्योंकि जब तक अलगाववादियों के हितों को पोषित करने वाली बातों का मौन समर्थन किया जाता रहेगा तब तक घाटी में स्थायी शांति असंभव है। इस्लामिक देशों के समूह और वैश्विक बिरादरी से भारत को इस मसले पर मिला जुला सहयोग ही मिलता है जिससे मसले को सुलझाने में कोई ख़ास मदद नहीं मिलती है. सभी की अपनी प्राथमिकताएं और मजबूरियां हैं जिनके साथ उन्हें जीना पड़ता है पूरे राज्य में बेहतर प्रशासनिक पकड़ के लिए अब इसे तीन हिस्सों में बांटकर देखा जाना चाहिए जिससे केंद्र से मिलने वाली सहायता का बराबर वितरण कर पूरे राज्य का विकास सुनिश्चित किया जा सके. राज्य में आधारभूत विकास के लिए सर्वदलीय बैठक में विभिन्न परियोजनाओं को राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर सीधे केंद्र बजट का आवंटन किया जाना चाहिए और उसे भी भ्रष्टाचार से मुक्त रखना चाहिए। राज्य के मौसम के अनुकूल आईटी और उससे जुडी कंपनियों को यहाँ करने की अनुमति और प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए जिससे आने वाले समय में कश्मीरी युवाओं को इस क्षेत्र में रोज़गार मिल सके. कश्मीर को बयानों की नहीं ठोस उपायों की आवश्यकता है जिससे राज्य में विकास की गतिविधियों को बढ़ाया जा सके और युवाओं को भटकने से भी रोका जा सके।

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