>गुर्जर विवाद

>राजस्थान में एक बार फिर से गुर्जर विवाद ने सरकार समेत आम आदमी की जिंदगी को दूभर करना शुरू कर दिया है. जैसा कि पहले भी कई बार हो चुका है इस विवाद के कारण बहुत सारी गतिविधियाँ ठप पड़ जाती हैं. अभी तक जो कुछ भी किया या कहा जा रहा है उससे गुर्जरों को कुछ भी हासिल नहीं हो पा रहा है ? फिर भी सरकार या गुर्जर समुदाय मिलकर किसी भी नतीजे पर नहीं पहुँच पा रहे हैं. यह सही है कि लोकतंत्र में सभी को अपने मन की बातें करने का पूरा हक है फिर भी अभी तक जिस तरह से हर पक्ष अपनी ही करने में लगा हुआ है उससे तो यही लगता है कि लोग इस मुद्दे को समझने के लिए अभी भी तैयार नहीं हैं ?
       देश में बहुत सारी समस्याएं पहले से ही मौजूद हैं और उनको बढ़ाते हुए हमारे लोग ही कुछ और ऐसा करने लगते हैं जिनका कोई मतलब नहीं होता है. आखिर क्या कारण है कि हम तभी कुछ करना चाहते हैं जब पानी सर से निकलने लगता है ? क्यों नहीं इन सारी समस्याओं का उचित समाधान निकालने के लिए हम समय रहते प्रयास नहीं कर पाते हैं ? आज भी देश में जो कुछ भी चल रहा है उसके लिए हम सभी कहीं न कहीं से ज़िम्मेदार हैं और हम यह कहकर इनसे पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं कि यह हमारी समस्या नहीं है ? आखिर यह देश हमारा है  तो गुर्जर भी हमारे हैं न ? देश में चाहे सिंगुर में कुछ हो या दादरी में कौन पिस्ता हैं इन सारे आन्दोलनों में ? किसको क्या हासिल होता है ?

     अब समय है कि पूरे देश में इस तरह के किसी भी मसले पर पूरी सावधानी के साथ विचार किया जाए क्योंकि देश के किसी भी हिस्से में कुछ भी होने पर पूरा देश उसके प्रभाव से बच नहीं पाता है. गुर्जरों के आन्दोलन से अकेले रेलवे को ही करोड़ों का नुकसान हो जाने वाला है और पता नहीं कितने लोगों को भी इस सबसे कितनी असुविधा होने वाली है ? सरकार को कानून और संविधान के दायरे में रहते हुए इनकी उचित मांग पर जल्दी से विचार करना चाहिए जिससे राजस्थान फिर से अराजकता की भेंट न चढ़ जाये ? साथ ही गुर्जर नेताओं को भी यह सोचना चाहिए कि उनकी जायज़ मांग पर विचार किया जायेगा पर इस तरह से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है…  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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