गुजरात पुलिस की मॉक ड्रिल

                                                      देश की आंतरिक सुरक्षा में लगी हुई पुलिस के द्वारा भी जाने-अनजाने कई काम ऐसे कर दिए जाते हैं जिनका संवेदना के स्तर पर बहुत ही निम्न प्रदर्शन होता है. ताज़ा घटना में गुजरात में सूरत पुलिस द्वारा जिस तरह से आतंकियों से निपटने की एक मॉक ड्रिल का आयोजन किया गया उसके पीछे भी उसकी मंशा यही रही होगी कि वह भी अपने स्तर से किसी भी आतंकी घटना को लेकर तैयार रहे और पूरी प्रक्रिया में जो भी कमियां सामने आती हैं उनसे निपटने की भी समुचित तैयारी रखे पर इस पूरी मॉक ड्रिल को लेकर जिस तरह से पुलिस द्वारा आतंकी को नमाज़ी टोपी पहने दिखाया गया उसका गुजरात समेत पूरे देश में सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर विरोध हुआ. मीडिया ने जिस तरह से इस मामले को सबसे पहले सबके सामने लाने का काम किया उसके बाद पूरा मामला यहाँ तक बढ़ गया कि गुजरात भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे को भी इसमें सक्रिय होना पड़ा और अंत में वहां की सीएम आनंदी बेन को भी इस मामले में माफ़ी मांगनी पड़ी है. पूरे देश में पुलिस किस तरह से बिना संवेदनाओं के काम करती हैं यह एक बार फिर से स्पष्ट हो गया है.
                                                   इस बात को अब किसी भी तरह से साबित नहीं किया जा सकता है कि यह काम जानबूझकर किया गया या पुलिस ने अनजाने में ही ऐसा किया क्योंकि दोनों ही पक्ष इस मामले में अपने अपने वक्तव्यों को सही ठहराने कि कोशिशें करते ही रहने वाले हैं पर गुजरात की सीएम द्वारा मामले में हस्तक्षेप किये जाने के बाद इसे अब समाप्त ही माना जाना चाहिए. साथ ही आम लोग सीएम से यह भी आशा रखते हैं कि वे गुजरात पुलिस को स्पष्ट रूप से यह सन्देश भी दे चुकी होंगी कि भविष्य में इस तरह के किसी भी मामले में धार्मिक स्तर पर पूरी संवेदनशीलता का परिचय भी उसके द्वारा दिया जायेगा. कुछ लोग इस पूरे मामले को यह कहकर भी बढ़ाने की कोशिशें करने वाले हैं कि आतंकी अधिकतर मुस्लिम ही हैं इसलिए पुलिस ने ऐसा किया था पर इस तरह के कुतर्कों का कोई मतलब नहीं बनता है क्योंकि २६/११ के आतंकियों ने अपनी पहचान को छिपाने के लिए हाथों में मौली बाँध रखी थी. आतंक का कोई चेहरा नहीं होता यही पर दुर्भाग्य से भारत में आतंक के अधिकांश मामले इस्लामी आतंकियों से जुड़े होने के कारण पुलिस की सोच भी संभवतः वैसी ही बन रही है जो कि चिंताजनक बात है.
                                                   आतंकी जिस देश काल में हमला करते हैं वे अपने को उस माहौल के अनुरूप ढालने का काम पहले ही किया करते हैं क्योंकि यदि इस तरह के मामलों में उनसे चूक हो जाये तो उनकी सही पहचान सामने आ जाने का खतरा होता है. आतंकी भी खौफ में जीते हैं इसका पता इस बात से ही चलता है कि आईएस जैसा खूंखार संगठन भी अपने लोगों को नक़ाब पहना कर ही बाहर भेजता है जिससे उनकी पहचान पूरी तरह से छिपी रह सके. पूरी दुनिया में सक्रिय इस्लामी आतंकी भारत के मुसलमानों को समाज से अलग थलग करने की हर संभव कोशिशें करने में लगे हुए हैं और जब तक वे इसमें सफल नहीं होते हैं भारत में उनके मंसूबे आगे नहीं बढ़ने वाले हैं. इस परिस्थिति में समाज की समरसता को बनाये रखने के लिए हर स्तर पर निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है वर्ना देश के कुछ लोग ही उनके इन खतरनाक मंसूबों को पूरा करने कि तरफ बढ़ सकते हैं. सूरत पुलिस द्वारा निश्चित तौर पर इस तरह की लापरवाही दिखाना बहुत ही असंवेदनशील मसला है पर अब इस मामले को पूरी तरह समाप्त मान कर आने वाले समय में ऐसी किसी भी परिस्थिति से बचने के लिए पूरे देश के सुरक्षा बलों के आवश्यक दिशा निर्देश जारी किये जाने की आवश्यकता भी है.          
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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