खुदरा एफ़डीआई की चुनौतियाँ या अवसर ?

                    जैसा कि पहले से ही तय था कि बहस के दौरान अपने को सरकार की नीति के ख़िलाफ़ दिखाने वाले यूपी के अवसरवादी दल सपा-बसपा सदन में वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहकर सरकार को बचाने का काम करने वाले है ठीक वैसा ही हुआ भी पर इस तरह के अनिच्छापूर्ण समर्थन या विरोध से देश को क्या मिल पाता है यह अभी भी किसी राजनैतिक दल को नहीं मालूम है. देश में केवल विरोध के नाम पर ही विरोध करने की जो राजनीति पिछले कुछ दशकों से हावी हुई है उसने कई बार महत्वपूर्ण मुद्दों पर देश की निर्णय लेने की क्षमता पर ही सवाल लगाये हैं और उससे बहुत बड़ा नुकसान भी झेला है. सवाल किसी एक नीति या कानून का नहीं है हर मुद्दे पर संसद में एक दूसरे को नीचा दिखने की आदत के कारण क्या हमारा राजनैतिक तंत्र देश के विकास के लिए बनाई जाने वाली विभिन्न परियोजनाओं में रोड़े नहीं अटकाता रहता है ? किसी भी नीति के दो पहलू हुआ करते हैं हो सकता है कि वही नीति किसी देश में बहुत सफलता से चल रही हो पर किसी अन्य देश में वह पूरी तरह से आत्मघाती साबित हो गयी हो पर इसके लिए किसी भी नीति को लागू करने से पहले उसके परिणामों पर विचार किया जाना बहुत आवश्यक है क्योंकि हवा में तीर चलाने से किसी को भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है.
            खुदरा एफ़डीआई पर देश में जिस तरह का माहौल बनाया गया उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि इस पूरे प्रावधान में जिस तरह से कड़े नियमों को पहले से ही प्रस्तावित किया गया है उन पर विचार किये जाने की आवश्यकता थी और यदि कोई नियम ऐसा लग रहा है जिसमें कहीं से कोई कमी नज़र आ रही है तो उस पर विमर्श की आवश्यकता थी पर सरकार ने इसे पारित करवाने को तो विपक्ष ने इसको रोकने के लिए कमर कस ली जिससे इन प्रावधानों में अच्छे बहस के माहौल में जो संशोधन किये जा सकते थे वह अवसर भी जाता रहा ? पूरे प्रस्ताव में जिस तरह से केवल चुनिन्दा बड़े शहरों में ही बड़ी आधारभूत संरचना के साथ इन प्रस्तावों की अनुमति दी गयी  हैं वह भी अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे प्रभाव का आंकलन करने में इस तरह से आने वाले समय में मदद मिल जाएगी और इसे लागू करना या न करना जिस तरह से राज्य सरकारों पर छोड़ दिया गया है उसके बाद किसी भी दल को इस बात की स्वतंत्रता मिल जाती है कि वह अपने शासित राज्य में इसे अपनाये या नहीं फिर भी इसको लेकर इतना हल्ला मचाया गया जैसे कोई विदेशी कम्पनी कल ही आकर पड़ोस के किरण व्यवसायी की जगह पर नुक्कड़ में आ जाएगी.
         यह भी सही है कि आने वाले समय में इससे जहाँ बाज़ार में पुनर्गठन की शुरुआत हो सकेगी वहीं पर उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच में पनपने वाली दलाली की कड़ी को भी तोड़ने में सहायता मिल जाएगी क्योंकि अभी तक उत्पादक किसान को कम मूल्य पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है और बिचौलिए मोटा माल कमा कर उपभोक्ताओं से अधिक मूल्य वसूलने में पीछे नहीं रहते हैं ? देश में बाज़ार की जो संस्कृति है उसमें किसी भी विदेशी कम्पनी के लिए काम करना उतना आसान नहीं रह जाने वाला है जिसकी सोचा जा रहा है क्योंकि हमारे पास की दुकान से हमें उधार सामान मिल जाने की जो सुविधा मिलती है वह किसी बड़े स्टोर में नहीं मिल सकती है और घर के पास का दुकानदार आवश्यकता पड़ने पर दुकान से कुछ सामान निकाल कर हमें किसी भी समय उपलब्ध करवा देता है जो कि किसी बड़े स्टोर में संभव नहीं हो पायेगा. ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं का कौन सा वर्ग इन स्टोर्स तक जाकर छोटे दुकानदारों से दूर हो जायेगा यह भी आसानी से समझा जा सकता है. दुग्ध क्रांति में जब दूध उत्पादकों और विपणन करने वाली सहकारी संस्थाओं का गठजोड़ पूरे देश की तर्स्वीर ही बदल सकता है तो इस तरह से बड़े विदेशी पूँजी निवेश से डरने के स्थान पर हमें उसे अवसर में बदल कर अपने किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारने का काम करना चाहिए. अब यह हमारे नेताओं पर है कि वे किस तरह से इसे चुनौती के रूप में लेते हैं और इसे एक अवसर मानकर देश के आर्थिक विकास को गति देना चाहते हैं.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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