कश्मीर

देश के दूसरे हिस्सों में बैठकर कश्मीर पर समीक्षात्मक प्रवचन देना आसान होता है और कश्मीर में रहकर कश्मीर को समझना उतना ही मुश्किल। चुनाव के समय बड़गाम में कथित तौर पर ड्यूटी पर जा रहे एक जवान के साथ बदसलूकी का जो वीडियो सामने आया है उसमें जवान की कर्तव्यनिष्ठा में सहनशीलता की हद है क्योंकि चुनाव में पूरी पोलिंग पार्टी की कोशिश चुनाव सामग्री की रक्षा की होती है जिसमें ये पार्टी सफल भी रही। जवान द्वारा दिखाए गए संयम की स्वयं सीआरपीएफ ने तारीफ की है। आमतौर पर यह भारतीय सेना और अर्ध सैनिक बलों का सही चेहरा है वहां पर भी कोशिश यही थी कि किसी भी तरह जवानों को उकसा कर हिंसा को बढ़ाया जाये पर पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों का यह मंसूबा पूरा नहीं हो पाया तथा उनमें से ही किसी ने यह वीडियो बनाकर साझा किया है। कश्मीर घाटी की हालात समझे बिना कुछ ठोस किये जाने की वकालत करने वाले आज देश में बहुत बढ़ गए हैं तथा पीडीपी-भाजपा सरकार के साथ केंद्र सरकार भी इस मुद्दे पर दबाव में आ गयी है। आज केंद्र सरकार के लिए मुश्किल इसलिए भी अधिक हो रही है क्योंकि कभी खुद नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी एक के बदले १० सिरों की बात किया करते थे पर सरकार में आने के तीन वर्षों बाद भी वहां पर धरातल पर कोई परिवर्तन नहीं दिख रहा है बल्कि स्थिति २०१० जैसी होती जा रही है। इस वर्ष गर्मियों में सेना-अर्ध सैनिक बलों के साथ जम्मू-कश्मीर  और केंद्र सरकार के लिए भी कठिन समय आने वाला है। देश में सभी को केंद्र सरकार पर भरोसा करते हुए अनावश्यक बयांबायजी से पूरी तरह बचना चाहिए क्योंकि इससे घाटी में वही माहौल बनता है जो पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी बनाना चाहते हैं।

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