कश्मीरी पंडित और घाटी

कश्मीर के मुद्दे पर स्थलीय परिस्थितियों को समझे बिना ही जिस तरह से केंद्र और जम्मू कश्मीर सरकार की तरफ से अनावश्यक बयानबाज़ी होती रही उसके बाद ही पिछले वर्ष घाटी में अलगाववादियों को एक बार फिर से अपने मंसूबों को पूरा करने लायक माहौल बनाने में काफी मदद मिली थी जिसका असर पिछले वर्ष घाटी में लगातार होने वाले उग्र प्रदर्शनों में भी दिखाई दिया था. इससे पहले होने वाले अधिकांश प्रदर्शन कुछ दिनों में ही समाप्त हो जाते थे पर इस बार कश्मीरियों को अलगाववादी यह समझाने में सफल रहे थे कि घाटी में अलग से पंडितों के लिए बसाई जाने वाली कॉलोनी पूरी घाटी में आने वाले समय में फिलस्तीन जैसा माहौल बना देंगीं और घाटी में अन्य लोगों के आने और बसने का रास्ता भी खुल जायेगा. मानसिक तौर पर कश्मीरी मुसलमान इस बात पर पहले से ही बहुत सख्त रुख अपनाते हैं और इस बार भी उनकी प्रतिक्रिया अलगाववादियों कि मंशा के अनुरूप ही थी हालाँकि उनके इस सख्त रुख का कश्मीरी पंडितों के जीवन पर बहुत बुरा असर ही पड़ा है क्योंकि हमेशा भाईचारे की बातें करने वाले ये सभी लोग उस समय डर या धार्मिक कारणों से इन कश्मीरी पंडितों की बर्बादी को ख़ामोशी से देखते रहे थे जब १९८९ से उन पर चुन चुन कर अत्याचार शुरू किये गए थे.
वैसे सरकार की इस पहल से कश्मीरी पंडितों में भी कोई बहुत उत्साह नहीं दिखाई दिया था क्योंकि अलग कॉलोनी में वे रह तो सकते थे पर विभिन्न कामों के लिए उन्हें कभी न कभी बाहर भी जाना ही पड़ता और अलग जगह रहने के कारण उन  पर आते जाते हमले करना या डराना अलगाववादियों के लिए आसान ही होने वाला था. भाजपा ने अभी तक कश्मीरी पंडितों को लेकर जो रुख अपनाया हुआ था मोदी सरकार ने भी उसका ही समर्थन किया और कश्मीर की महबूबा सरकार को भी इसी तरह से सोचने को मजबूर किया जिसका परिणाम पिछले वर्ष सामने आ चुका है. हालाँकि अब भाजपा अपने इस एजेंडे से फिलहाल पूरी तरह पीछे हट चुकी है इस बात की आधिकारिक घोषणा उसकी तरफ से कभी भी नहीं की गयी पर संसद में झूठ बोल पाना किसी भी सरकार के लिए सबसे कठिन काम होता है इसलिए एक सवाल के जवाब में मोदी सरकार की यह नीति स्पष्ट रूप से तब सामने आ गयी जब ७ फरवरी को संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने बताया कि कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से रिहाइशी कॉलोनी बसाने का न तो कोई प्रस्ताव है और न ही सैनिक कॉलोनियां ही बसाई जाएंगी.
सरकार ने इस तथ्य को इतनी जल्दी स्वीकार कर लिया यह अच्छा ही है क्योंकि जब तक कश्मीर में विश्वास बहाली के और अधिक कदम नहीं उठाये जाते हैं तथा केंद्र और राज्य सरकार एक सुर में बोलना नहीं सीख लेती हैं तब तक इस तरह के मुद्दों पर बात करना भी कठिन ही होने वाला है. घाटी के मौसम और परिस्थितियों के अनुरूप यदि सरकार वहां पर सूचना प्रौद्योगिकी और उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में रोज़गार सृजन पर काम करना शुरू करे तो आने वाले समय में घाटी में काफी कुछ बदलाव लाये जा सकते हैं पर यह सब कुछ वैसा ही है कि कृत्रिम रूप से अशांत दिखने वाले इस क्षेत्र में कोई निवेशक क्यों आना चाहेगा ? इस माहौल में बदलाव के लिए अब बयानबाज़ी के स्थान पर कुछ ठोस कदम उठाकर घाटी के युवाओं के लिए रोज़गार बढ़ाने की दिशा में आवश्यक कदम भी उठाये जाने चाहिए. वहां सबसे बड़ी समस्या यह है कि दोनों सत्तारूढ़ दलों के वोटबैंक परस्पर एक दूसरे के घोर विरोधी और देखकर ही चिढ़ते हैं और दोनों दलों को अपने वोटबैंक को सुरक्षित रखने के लिए इस तरह की बयानबाज़ी करनी ही पड़ती है जिससे अंत में कश्मीर और देश का ही नुकसान होता है. जम्मू और घाटी के नेताओं समेत भाजपा के केंद्रीय नेताओं को भी अब यह समझना ही होगा कि कठोर बयान केवल पाकिस्तान के सन्दर्भ में ही दिए जा सकते हैं पर घाटी को लेकर इस तरह की बयानबाज़ी किसी भी तरह से उनके और देश के लिए उचित साबित नहीं हो सकती है.

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