आयोग राष्ट्रपति के पास

       केन्द्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के अपने आरक्षण वाले बयान पर अड़े रहने और कुछ वोटों की ख़ातिर चुनाव आयोग पर टिप्पणियां करने के बाद आयोग ने जिस तरह से एक अभूतपूर्व कदम के तहत राष्ट्रपति से इस मामले में शिकायत कर हस्तक्षेप करने की मांग की है वह बिलकुल उचित है क्योंकि जब सरकार में बैठे हुए लोग ही इस तरह से संवैधानिक संस्थाओं पर टिप्पणियां करने से नहीं चूकेंगें तो इन संस्थाओं का क्या औचित्य रह जायेगा ? भारतीय लोकतंत्र में सभी नागरिकों और दलों को इस बात की पूरी छूट दी गयी है कि वे चुनाव के समय एक जैसे धरातल पर काम करें जबकि वर्तमान में केन्द्रीय कानून मंत्री संविधान की इस भावना से खिलवाड़ कर रहे हैं ? यहाँ पर कुछ लोग केवल कुतर्क करते हुए कुछ अन्य नेताओं के इस तरह के बयानों को ढाल बनाने की कोशिश भी कर सकते हैं पर इस बार मामला सीधे उस मंत्री से जुड़ा हुआ है सामान्य दिनों में बदकिस्मती से जिसके अधीन ही चुनाव आयोग भी आता है ? आयोग ने इस बारे में यह फैसला लिया जो कि बहुत ही सटीक है क्योंकि इस देश में सभी को बराबर के अधिकार मिले हुए हैं और आयोग भी अपने कर्तव्यों को नियमपूर्वक पूरा करने के लिए तत्पर रहा करता है तो इस मामले में उससे इस तरह की अपेक्षा कुछ लोग तो कर ही रहे थे.
     इस तरह का कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि देश में कुछ लोगों को हर बात केवल एक ही चश्में से दिखाई देती है तो कल कोई इस बार पर भी आपत्ति कर सकता था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त भी एक मुस्लिम हैं और मुसलमानों को आरक्षण देने की बात पर एक मुस्लिम मंत्री के बयानों पर सिर्फ़ इसलिए चुप रहे क्योंकि इससे मुसलमानों को लाभ मिलने वाला था ? मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने यह दिखा दिया है कि देश पहले और बाक़ी सारी बातें बाद में हैं. देश में आज राजनैतिक तंत्र इतना नाकारा और मौकापरस्त हो चुका है कि उसे कहीं भी इस तरह के माहौल में हमेशा लाभ उठाने की बात ही सूझती रहती है. यह सही है कि सलमान खुर्शीद का पार्टी में अपना ही महत्त्व है पर वोटों के लालच में उन्होंने जिस तरह से पार्टी को संकट में डालना शुरू किया है और देश की संवैधानिक आत्मा से खिलवाड़ करने की कोशिश की है उस स्थिति में उनका सरकार में बने रहने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि अब वे सरकार के लिए संकट मोचक नहीं बल्कि संकट कारक बन चुके हैं. आयोग का यह निर्णय इस बात की तरफ भी संकेत करता है कि अगर किसी भी नेता या दल ने उसे कमतर समझने की भूल की तो उसके ख़िलाफ़ कानून के दायरे में रहते हुए पूरी सख्ती से निपटा जायेगा भले ही वह देश का कानून मंत्री ही क्यों न हो जिस पर देश को कानून से चलाने की ज़िम्मेदारी है.
    इस तरह की घटना के बाद जिस तरह से राष्ट्रपति ने इस मसले को तुरंत ही मनमोहन सिंह के पास भेज दिया है उससे यही लगता है कि आए वाले दिनों में सलमान के लिए कुछ अच्छा नहीं होने वाला है और इस मामले को देश के सामने एक नज़ीर के रूप में पेश करे का समय आ गया है कि कोई भी देश के संविधान से ऊपर नहीं है. यह घटना ठीक उसी तरह की लगती है जब शेषन ने अपने कार्यकाल के दौरान नेताओं के इस तरह के आचरणों पर पहली बार सख्ती करनी शुरू की थी और नेताओं को छोड़कर आम लोगों ने उसकी सराहना की थी जिसके बाद आज तक चुनाव आयोग की गरिमा बनी हुई है भले ही उस पर मोदी जैसे लोगों ने लिंगदोह के ज़माने में इटली से संपर्क होने तक की ओछी टिप्पणी की थी ? उस तरह की टिप्पणी करते समय भाजपा ने एक बार भी मोदी की आलोचना नहीं की थी क्योंकि तब वह मोदी को हीरो के रूप में पेश कर रही थी उन्हीं लिंगदोह की उस सख्ती के कारण ही मोदी फिर से सत्ता में आये तो उन्हें एहसास हुआ होगा कि उन्होंने बेकार के आरोप लगाये थे आज राजनैतिक लाभ के लिए भाजपा खुर्शीद का बलिदान चाहती है पर उस समय उसकी नैतिकता कहाँ थी ? नेता राजनीति करें तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है पर सुविधा के अनुसार संविधान को परिभाषित करने की इनकी बपौती को जिस तरह से आयोग ने चुनौती दी है उससे पूरा देश अपने भविष्य के लिए निश्चिन्त हो सकता है.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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