>अब चेते अब्दुल्लाह…

>कश्मीर घाटी में चल रही षड़यंत्र की कोशिशों के बीच आख़िर उमर अब्दुल्लाह को यह बात समझ में आ ही गयी कि  जब तक इस मसले पर सभी राजनैतिक दल बैठकर चर्चा नहीं करेंगें तब तक इसका कोई ठोस हल नहीं निकल पायेगा ? जब इतने दिनों तक हिंसा और विरोध का दौर चलता रहा तो सभी दलों के नेता अपनी राजनैतिक रोटियों को इसकी आंच में सेंकने की कोशिश करते रहे पर अब जब इन्हीं लापरवाहियों के कारण पानी सर से ऊपर आ गया है तो सभी को लगने लगा की कहीं बाज़ी हाथ से ही न निकल जाये ? इस सारे मामले में कहीं न कहीं उन तत्वों का बहुत बड़ा हाथ है जो कश्मीर में उपजने वाली शांति की किसी भी लहर को झेलम में ही डुबोने में विश्वास करते हैं उन्हें लगता है कि चाहे जितने भी युवक उन्माद में आकर मारे जाएँ पर भारत विरोध की आग़ कैसे भी जलती रहनी चाहिए. अगर कश्मीर में युवा पुलिस की गोली से मर रहे हैं तो इसमें पुलिस की कोई गलती नहीं दी जा सकती है क्योंकि विरोध करने का हक़ सभी को है पर सुनियोजित तरीके से सुरक्षा बलों पर हमला करने वालों को निर्दोष युवक तो नहीं कहा जा सकता है ?
            अच्छा हो कि इन युवकों के माँ बाप इनको इस आन्दोलन के समय घर में ही रखने का प्रयास करें क्योंकि मरने वाल आम कश्मीरी युवक किसी से कोई बैर नहीं रखता है बस उसे तो कहीं न कहीं बहकाया जा रहा है ? आज यदि इन युवकों को इस भीड़ से हटा लिया जाये तो कौन और है जो वहां पर प्रदर्शन करने के लिए आगे आना वाला है ? राजनैतिक हित इतने कठोर भी हो सकते हैं कि लोगों को किसी भी बात पर भड़का कर अपना उल्लू सीधा करने के अलावा उनके पास कोई काम नहीं रहता है. कुछ लोग इस सारे मसले को भारत-पाक वार्ता से भी जोड़कर देख रहे हैं सवाल यह है कि क्या आज कट्टरपंथियों के पास यह ताक़त है कि वे किसी भी वार्ता को पटरी से उतर सकें ? यह ताक़त तो पाक समर्थित आतंकियों के पास ज़रूर है क्योंकि बिना अपने आकाओं से हरी झंडी मिले इनकी इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि वे इस तरह की गतिविधयों का सञ्चालन कर सकें.
      सर्वदलीय बैठक में सभी को यह देखना होगा कि किस तरह से इस समय कुछ दिनों तक इन युवकों को सड़कों पर आने से रोका जाये क्योंकि अगर वे इसी तरह से सड़कों पर आकर पुलिस पर हमला करते रहेंगें तो आत्मरक्षा में चलायी गयी गोलियों से मरने वालों कि सख्या निरंतर बढती ही रहेगी. सभी जानते हैं कि घाटी में सुरक्षा बल बहुत संयम बरत रहे हैं क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो मरने वालों कि संख्या बहुत ज्यादा होती. इस तरह के संयम के लिए इस सभी बलों को बधाई है और आशा है कि वे आगे भी पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी काम निभाते रहेगें.   

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है…

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  2. >क्योंकि बिना अपने आकाओं से हरी झंडी मिले इनकी इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि वे इस तरह की गतिविधयों का सञ्चालन कर सकें.