घड़े के पानी के गुण

 

कश्मीर – मोदी को नयी चुनौती

लम्बे असंतोष के बाद जिस कश्मीर की तरफ देशी विदेशी पर्यटक रुख करने लगे थे पिछले दो सालों में वहां किस तरह की परिस्थितियां उत्पन्न हो गयी हैं केंद्र और जम्मू कश्मीर सरकार के लिए आज इस विषय पर गंभीरता से सोचने का समय आ गया है क्योंकि अलगाववादियों के आह्वाहन पर घाटी में बंद बहिष्कार एक सामान्य सी घटना बन चुकी थी जिसमें उन दिनों को छोड़कर घाटी पूरी तरह से सामान्य ही रहा करती थी। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान घाटी में मुसलमानों की जनसँख्या के आधार ओर उसे भारत से अलग करने के अपने एजेंडे में १९४७ से ही लगा हुआ है फिर भी इतने वर्षों में नब्बे के दशक से शुरू हुए संघर्षों ने घाटी को अधिक नुकसान पहुँचाया था. भाजपा के पास एक अच्छा मौका था जो अब खत्म होता सा लगता है क्योंकि सितम्बर २०१४ की बाढ़ के बाद जिस तरह से सेना और पीएम मोदी की स्वीकार्यता भी घाटी में बढ़ी थी आज केवल जम्मू के भाजपा विधायकों की हठधर्मिता के चलते आज वह निम्नतम स्तर पर है। महबूबा मुफ़्ती के लिए भी इस परिस्थिति में सरकार चलाना बहुत कठिन होने वाला है तो संभवतः वे सभी को चौकाते हुए खुद ही राज्य में राज्यपाल शासन लगाने के लिए इस्तीफ़ा दे सकती हैं क्योंकि कश्मीरियों में नेशनल कॉन्फ्रेंस से अच्छी पैठ होने के बाद भी महबूबा आज सरकार और कश्मीरियों के हितों के साथ राज्य और केंद्र के संबंधों पर अनिर्णय की स्थिति में पहुंची हुई लगती हैं. कम वोट डाले जाने के बाद लोकसभा के रक्त रंजित चुनावों में पीडीपी की हार इस बात की तरफ इशारा भी करती है लोकतान्त्रिक ढंग से चुनी हुई और अपनी ही साझा सरकार को भंग कर केंद्र का शासन लगाने के लिए पीएम मोदी और एचएम राजनाथ सिंह समेत भाजपा को बहुत हिम्मत करनी होगी। वर्तमान परिस्थिति में राज्य सरकार में भागीदारी या घाटी में माहौल इन दोनों में से क्या सरकार की प्राथमिकता में है यह भाजपा को तय करना होगा। साथ ही केंद्र को उन कारणों को भी तलाशना होगा जिनके चलते आज घाटी में सेना और अर्धसैनिक बलों का आना जाना मुश्किल होता जा रहा है। संसद, कार्यशालाओं और रैलियों में पाकिस्तान पर आरोप लगाकर कश्मीर की मुश्किलों को कम नहीं किया जा सकता है यह पीएम मोदी को समझना ही होगा।  केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वे अपने अपने स्तर से प्रयास कर माहौल को सुधारने का प्रयास करें क्योंकि अब वार्षिक अमरनाथ यात्रा का समय भी निकट आ रहा है और इस परिस्थिति में पहलगाम और बालटाल दोनों ही तरफ से यात्रा को संपन्न कराना बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाला है। आम कश्मीरी के लिए इस पर्यटन सीजन में कुछ कमाने और पर्यटकों के लिए कश्मीर में घूमने का यही उचित समय होता है पाकिस्तान पहले ही इस तरह कई पर्यटक सीजन बर्बाद कर चुका है तथा वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए आने वाले समय में इसके सुचारु रूप से चलने की संभावनाएं नगण्य ही दिखाई देती हैं. बेरोज़गार कश्मीरी पाकिस्तान को हर तरह से अच्छे लगते हैं क्योंकि तभी उनको अपनी सामान्य आवश्यकताएं पूरी करने के लिए भारत के खिलाफ उकसाने में उसे मदद मिलती है। घाटी में सब कुछ सामान्य कभी नहीं रहा पर उसे इतना असामान्य भी नहीं किया जाना चाहिए कि परिस्थितियां और बिगड़ जाएँ।

 

विचारधाराओं की लड़ाई

देश में भाजपा के खिलाफ जिस तरह से सभी दल एकजुट होने की बातें कर रहे हैं वे अल्पावधि में भले ही कुछ लाभ दे जाएँ पर आने वाले समय में धरातल पर विचारधाराओं की लड़ाई में इन दलों को दीवालिया करने और चुनावी हार तक ले जाने वाले ही साबित होने वाले हैं। विरोध करने के लिए विरोध नहीं होना चाहिए क्योंकि देश ने पहले भी केवल सत्ता पाने के लिए किये जाने वाले बेमेल गठजोड़ों को १९७७ और १९८९ में देखा है। बेशक वह पीढ़ी आज अपनी राय दे पाने की स्थिति में नहीं हो पर सच्चाई बदल नहीं सकती है। नेहरू से लगाकर सोनिया तक कांग्रेस ने और ३७ वर्ष में अटल से लेकर शाह तक भाजपा ने अपनी विचारधाराओं का पोषण ही किया है। नेहरू और उसके बाद लोहिया के समाजवाद से आज का समाजवाद मेल नहीं खा रहा है तो डॉ अंबेडकर के शुरू किये गए दलित चेतना से कांशीराम तक होते हुए आज मायावती तक आने वाले सम्पूर्ण दलित विमर्श में आज दलित कहीं पीछे छूट गए हैं और सभी के लिए केवल सत्ता पाना महत्वपूर्ण हो चुका है। हर दल को मज़बूती से अपनी विचारधारा को ही पुष्ट करने के बारे में सोचना चाहिए और जिन मुद्दों पर बिना राजनैतिक द्वन्द और अंतर्विरोध के साथ चल सकने की क्षमता वहीं पर सत्ता सँभालने के बारे में सोचना चाहिए। आज ये दल जितना भाजपा को घेरने की कोशिशें करेंगें उसका उतना ही गुणात्मक लाभ भाजपा को मिलेगा क्योंकि इस तरह पाले खींचकर मैदान में उतरना भाजपा को सदैव सुहाता है। कांग्रेस के लिए यह आत्म मंथन का समय है क्योंकि उसके पास आज भी देश भर में कहीं मजबूत तो कहीं कमज़ोर संगठन मौजूद है इसलिए पूरे देश का परिदृश्य सोचकर उसे अपनी नीतियां बनानी होंगीं। लोकतंत्र में वैचारिक भिन्नता उसकी जीवंतता और सकारात्मक को दिखाता है। सत्ता के लालच में आज कितने कांग्रेसी और अन्य दलों के नेता सतत सत्ता के शिखर की तरफ बढ़ती भाजपा में जा चुके हैं इससे स्पष्ट हो जाता है कि आज की राजनीति में विचारधाराएं नेताओं के लिए मायने नहीं रखती हैं। देश के लिए बेहतर यही होगा कि अपने अपने प्रभाव और कार्य क्षेत्र में सभी राजनैतिक दल अपनी विचारधारा के अनुरूप लड़ाई लड़ने का काम करें भाजपा की केंद्र और राज्यों में सरकारों के जन विरोधी क़दमों का लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध करने की कोशिश करें। सत्ता जनता के बीच धूल फांककर मिलती है न कि जनता की आँखों में धूल झोंककर। सरकारों को काम करने दीजिये और मुद्दों के आधार पर उनका प्रभावी और सकारात्मक विरोध भी दर्ज़ कराना सीखिए। लोकतंत्र में जनता जनार्दन होती है वो कब किस पर रीझ जाये कोई नहीं जानता इसलिए हर मुद्दे पर राजनीति करने के स्थान पर खुद को जनहित से जुड़े कार्यों को जोड़ जनता की समस्याएं सुलझाने और उसका लाभ उठाकर स्वीकार्य बनने की कोशिश करनी चाहिए।